'2005 में दुष्कर्म का आरोप नहीं था, 2006 में अचानक कैसे जुड़ा', साध्वी रेप केस में राम रहीमों के वकीलों का सवाल
साध्वी यौन शोषण मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम ने हाई कोर्ट में अपनी सजा के खिलाफ अपील की है।

डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम (फाइल फोटो)
HighLights
अभियोजन की कहानी में विरोधाभास और देरी पर सवाल
2005 के बयान में दुष्कर्म का आरोप नहीं, 2006 में जुड़ा
जांच अधिकारी की निष्पक्षता और घटनास्थल पर अस्पष्टता
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। साध्वी यौन शोषण मामले में सजा के खिलाफ डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह ने हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान जांच और ट्रायल प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि अभियोजन की पूरी कहानी “विरोधाभासों, देरी और दबाए गए बयानों” पर आधारित है।
डेरा प्रमुख के वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि कथित घटनाएं 1999 की बताई गईं, लेकिन पहली बार दुष्कर्म का आरोप 2006 में सामने आया, जबकि 2002 से 2005 तक दिए गए कई बयानों में ऐसा कोई आरोप नहीं था।
एक साल बाद अचानक जोड़ा गया दुष्कर्म का आरोप
बचाव पक्ष ने कहा कि पीड़िता ने 25 फरवरी 2005 को दिए बयान में कहीं भी दुष्कर्म का आरोप नहीं लगाया था। उस बयान में केवल दूसरे मामले का उल्लेख था। इसके बावजूद 2006 में अचानक दुष्कर्म का आरोप जोड़ा गया।
अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता “तीन-तीन एक्सकुलपेटरी बयान” ( निर्दोष साबित करने वाला या आरोप से राहत देने वाला) ट्रायल कोर्ट ने विचार में ही नहीं लिए और केवल बाद के 161 सीआरपीसी बयानों पर भरोसा किया गया।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कथित “लव लेटर” का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। दलील दी गई कि अभियोजन का दावा है कि 1999 में पीड़िता को एक प्रेम पत्र दिखाकर दबाव बनाया गया, लेकिन रिकर्ड में मौजूद अहम पत्र वर्ष 2001 का है। ऐसे में सवाल उठता है कि 2001 के पत्र से 1999 में कैसे ब्लैकमेल किया जा सकता था।
कहानी को पूरी तरह अविश्वसनीय बनाता है
बचाव पक्ष ने कहा कि यह अभियोजन की कहानी को पूरी तरह अविश्वसनीय बनाता है। बचाव पक्ष के वकील अदालत को यह भी बताया कि कथित घटनास्थल को लेकर भी भारी अस्पष्टता है। चार्ज में केवल “डेरा सच्चा सौदा क्षेत्र स्थित गुफा” लिखा गया, जबकि गवाही में दो अलग-अलग डेरों पुराने और नए डेरा का उल्लेख आया, जो 7-8 किलोमीटर दूर बताए गए।
दोनों जगह “गुफा” होने की बात सामने आई। बचाव पक्ष ने जांच अधिकारी इंस्पेक्टर सतीश डागर की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। कहा गया कि उनके खिलाफ पहले से शिकायतें थीं और उन्होंने 2005 में ही ऐसे सवाल तैयार करवा लिए थे, जिनका संबंध कथित प्रेम पत्र और यौन आरोपों से था, जबकि उस समय तक पीड़िता ने दुष्कर्म का आरोप लगाया ही नहीं था।
यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी का मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया बचाव पक्ष के वकील जितेंद्र खुराना व अन्य पक्ष रखते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपने निर्णय में “असाधारण परिस्थितियों में असाधारण उपाय” जैसे शब्द इस्तेमाल कर कानून की स्थापित कसौटियों से हटकर फैसला दिया।
उन्होंने कहा कि अदालत को संविधान, साक्ष्य और दंड प्रक्रिया संहिता के आधार पर फैसला करना चाहिए, न कि किसी धारणा या सामाजिक प्रभाव के आधार पर। सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई जुलाई माह तक स्थगित कर दी।
2017 में ठहराया था दोषी
ज्ञात रहे कि डेरे की दो साध्वियों के यौन शोषण मामले में पंचकूला की सीबीआई कोर्ट ने अगस्त 2017 में डेरा मुखी को दोषी करार देते हुए उसे 10-10 साल की सजा सुनाई थी और साथ ही डेरा मुखी पर 30 लाख 20 हजार रुपए का जुर्माना भी लगा दिया था।पहले मामले में दस वर्ष की सजा पूरी होने के बाद दूसरे मामले में दस वर्ष की सजा शुरू होनी है। सजा को डेरा मुखी ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए अपील दायर की थी
