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'पीड़िता नाबालिग हो तो सहमति का कोई महत्व नहीं...', पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के दोषी की सजा रखी बरकरार

Published: Mon, 20 Apr 2026 10:51 PM (IST)

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए दोषी की सजा में ...और पढ़ें

पीड़िता के नाबालिग होने पर संबंधों में उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं: हाई कोर्ट

पीड़िता के नाबालिग होने पर संबंधों में उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं: हाई कोर्ट

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने दुष्कर्म मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी

  2. पीड़िता नाबालिग होने पर सहमति का महत्व नहीं

  3. दोषी की सजा में विशेष परिस्थितियों में राहत

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन दोषी की सजा में महत्वपूर्ण राहत दी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गंभीर अपराधों में दोष सिद्ध होने के बावजूद यदि विशेष परिस्थितियां मौजूद हों, जैसे स्वास्थ्य की खराब स्थिति और लंबे समय का अंतराल तो सजा में नरमी बरती जा सकती है।

यह आदेश जस्टिस रुपिंदरजीत चहल की पीठ ने उस अपील पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा अपहरण और दुष्कर्म के तहत दी गई सजा को चुनौती दी गई थी। अभियोजन के अनुसार, करीब 16 वर्षीय नाबालिग पीड़िता को आरोपित विवाह का झांसा देकर अपने साथ ले गया और उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाए। बचाव पक्ष ने दलील दी कि पीड़िता आरोपित के साथ स्वेच्छा से गई थी और संबंध उनकी आपसी सहमति से थे।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करते हुए पाया कि पीड़िता की उम्र स्कूल रिकॉर्ड और मां की गवाही से स्पष्ट रूप से नाबालिग सिद्ध होती है। अदालत ने दो टूक कहा कि जब पीड़िता नाबालिग हो, तब सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं रह जाता।

न्यायालय ने पीड़िता की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए यह भी कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में चोटों का अभाव या एफआइआर दर्ज कराने में देरी जैसे पहलू अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करते। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को तर्कसंगत और प्रमाणों के अनुरूप बताया और दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया।

न्यायालय ने कहा कि दुष्कर्म जैसे मामलों में एफआइआर दर्ज कराने में देरी होना असामान्य नहीं है। सामाजिक दबाव, परिवार की प्रतिष्ठा और पीड़िता की मानसिक स्थिति जैसे कारणों से पुलिस तक पहुंचने में समय लग सकता है। ऐसे में केवल देरी के आधार पर पूरे मामले को संदेहास्पद नहीं ठहराया जा सकता।

सजा के प्रश्न पर विचार करते हुए अदालत ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखा। यह मामला 23 वर्ष से अधिक पुराना था। साथ ही आरोपित को लकवा (पैरालिसिस) का दौरा पड़ चुका है, जिससे उसके शरीर का बायां हिस्सा निष्क्रिय हो गया है। इसके अतिरिक्त, समय बीतने के साथ आरोपित और पीड़िता दोनों अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं और अलग-अलग विवाह कर चुके हैं।

अदालत ने इन सभी परिस्थितियों को 'पर्याप्त और विशेष कारण' मानते हुए सजा में नरमी बरतना उचित समझा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा को घटाकर आरोपित द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया।