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जमीन अधिग्रहण के बाद नौकरी की उम्मीद टूटी, पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने 25 साल पुरानी याचिका की खारिज

Published: Fri, 25 Sep 2026 04:12 PM (IST)

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण के बाद बीपीसीएल में नौकरी की मांग वाली 25 साल पुरानी याचिका खारिज कर दी।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट फाइल फोटो

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट फाइल फोटो

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने 25 साल पुरानी नौकरी याचिका खारिज की।

  2. याचिकाकर्ता साक्षात्कार में बीपीसीएल द्वारा उपयुक्त नहीं पाया गया।

  3. जमीन अधिग्रहण के बाद नौकरी का वादा पूरा नहीं हुआ।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। जमीन अधिग्रहण के बाद पेट्रोलियम कंपनी में नौकरी दिए जाने की उम्मीद लगाए बैठे व्यक्ति को करीब 25 साल बाद भी राहत नहीं मिल सकी।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) में नियुक्ति की मांग को लेकर दायर 2001 की याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को परियोजना प्रभावित व्यक्ति (पीएपी) श्रेणी में नियुक्ति के लिए विचार का अवसर दिया गया था, लेकिन साक्षात्कार में उसे उपयुक्त नहीं पाया गया था। ऐसे में नियुक्ति का अधिकार नहीं बनता।

जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने फरीदाबाद निवासी सतिंदर सिंह और एक अन्य की ओर से दायर याचिका पर फैसला सुनाया। याचिका में आठ नवंबर 2000 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके माध्यम से बीपीसीएल में नियुक्ति का दावा खारिज किया गया था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि 18 जनवरी 1991 के समझौते के तहत जमीन मालिकों या उनके आश्रितों को रोजगार देने का आश्वासन दिया गया था।

'मृत जमीन मालिक एकमात्र आश्रित और नामित व्यक्ति'

उसका दावा था कि वह मृत जमीन मालिक का एकमात्र आश्रित और नामित व्यक्ति था, फिर भी उसे नौकरी नहीं दी गई।याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि नौकरी के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता सातवीं कक्षा थी और वह उस समय स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। इसके बावजूद उसे नियुक्ति के लिए उचित रूप से नहीं चुना गया।

बीपीसीएल की ओर से हाई कोर्ट में दाखिल जवाब में बताया गया कि एलपीजी बॉटलिंग प्लांट के निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहित होने के बाद परियोजना प्रभावित लोगों को पुनर्वास के तौर पर रोजगार देने पर विचार किया गया था।

जमीन की मात्रा के आधार पर प्राथमिकता तय की गई थी, लेकिन नियुक्ति उपलब्ध पदों और निर्धारित योग्यता के अधीन थी।

118 परियोजना प्रभावित लोगों के लिस्ट तैयार

जिला प्रशासन की ओर से शुरुआत में 118 परियोजना प्रभावित लोगों की सूची तैयार की गई। बाद में जांच और पात्रता के सत्यापन के बाद 65 लोगों की सूची भेजी गई। इसके अतिरिक्त 25 अन्य लोगों के नाम भी भेजे गए। कंपनी ने इन्हीं सूचियों के आधार पर पात्र उम्मीदवारों को नियुक्ति के लिए विचार किया।

अदालत को बताया गया कि सतिंदर सिंह और उसके पिता का नाम शुरुआती सूचियों में नहीं था। वर्ष 1997 में दोबारा दावों के सत्यापन के दौरान उसके पिता का नाम पहली बार परियोजना प्रभावित व्यक्ति के दावे के लिए भेजा गया।

इसके बाद सतिंदर सिंह को सभी दस्तावेजों के साथ स्क्रीनिंग और साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। 30 दिसंबर 1997 को साक्षात्कार हुआ।

इसमें जिला प्रशासन के प्रतिनिधि के रूप में तत्कालीन जिला राजस्व अधिकारी भी शामिल थे। साक्षात्कार पैनल ने सतिंदर सिंह को नौकरी के लिए उपयुक्त नहीं पाया।

कंपनी ने अदालत को यह भी बताया कि उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध रिक्तियों से अधिक थी और केवल उपयुक्त पाए गए उम्मीदवारों को ही नियुक्त किया जा सकता था।

जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने दोनों पक्षों की दलीलें और रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि प्रतिवादियों के लिखित जवाब से याचिकाकर्ता के दावे में कोई दम नहीं दिखता।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को नियुक्ति के लिए विचार और साक्षात्कार का अवसर दिया गया था, लेकिन चयन नहीं हुआ। इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और लंबित आवेदनों का भी निपटारा कर दिया।