बच्चे के कुआं पूजन में शामिल होने के लिए भी नहीं मिली राहत, उम्रकैद की सजा काट रहे झज्जर के कैदी की याचिका खारिज
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे ललित उर्फ मोहना को बहन ...और पढ़ें

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
HighLights
ललित उर्फ मोहना को बहन के कुआं पूजन के लिए राहत नहीं मिली।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत की याचिका खारिज की।
हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है दोषी।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे झज्जर निवासी ललित उर्फ मोहना को बहन के बच्चे के कुआं पूजन समारोह में शामिल होने के लिए अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है।
आरोपित ने तीन सप्ताह के लिए सजा स्थगित करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। उसका कहना था कि बहन के बच्चे का कुआं पूजन होना है और परिवार में पिता की मृत्यु के बाद समारोह की तैयारियों के लिए उसकी मौजूदगी जरूरी है।
हालांकि, जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस पूजा चोपड़ा की पीठ ने परिस्थितियों पर विचार करने के बाद याचिका खारिज कर दी।ललित उर्फ मोहना की ओर से दलील दी कि वह पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद है।
उसके पिता का वर्ष 2017 में निधन हो चुका है। ऐसे में बहन के बच्चे के कुआं पूजन समारोह में भाई के तौर पर उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है और परिवार को तैयारियों में उसके सहयोग की आवश्यकता है।
21 जून को हुआ था बेटे का जन्म
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि उसकी पत्नी ने 21 जून 2026 को बेटे को जन्म दिया था। इसके बाद से वह न तो अपनी पत्नी से मिल पाया है और न ही अपने नवजात बच्चे को देख सका है।
इसी आधार पर उसने तीन सप्ताह के लिए अंतरिम रूप से सजा स्थगित करने की मांग की थी, ताकि वह पारिवारिक समारोह में शामिल होने के साथ पत्नी और बच्चे से भी मिल सके।
हरियाणा सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि ललित को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 34 के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है और उसे आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।
अदालत में पेश हिरासत प्रमाणपत्र के अनुसार, चार अक्टूबर 2026 तक याचिकाकर्ता कुल चार वर्ष, 11 महीने और 19 दिन की वास्तविक कैद काट चुका था। दोषसिद्धि के बाद उसने पांच महीने और पांच दिन की सजा काटी थी।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि पारिवारिक कारण सहानुभूति के योग्य हो सकते हैं, लेकिन इनके आधार पर तीन सप्ताह के लिए सजा स्थगित करने का पर्याप्त आधार नहीं बनता।
याचिकाकर्ता की परिस्थितियों को समझा जा सकता है: हाई कोर्ट
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की पारिवारिक परिस्थितियों को समझा जा सकता है, लेकिन वह हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी ठहराया जा चुका है और उसे उम्रकैद की सजा मिली है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अब तक काटी गई कैद की अवधि अपने आप में तीन सप्ताह की अंतरिम राहत देने का आधार नहीं बनती।
पीठ के अनुसार, याचिका में दिए गए कारण मुख्य रूप से व्यक्तिगत और पारिवारिक प्रकृति के हैं। मौजूदा मामले की परिस्थितियों में ये कारण सजा स्थगित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत की मांग खारिज कर दी
