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'पिता की आर्थिक स्थिति ममता का विकल्प नहीं', पंजाब-हरियाणा HC ने मां को सौंपी 5 साल के बच्चे की कस्टडी

Published: Sat, 03 Oct 2026 02:12 PM (IST)

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 4 साल के बच्चे की कस्टडी मां को सौंपने के एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा है।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट (फाइल फोटो)

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने 4 साल के बच्चे की कस्टडी मां को दी

  2. मां की भावनात्मक देखभाल पिता की आर्थिक स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण

  3. बच्चे का कल्याण सर्वोपरि, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका विचारणीय

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। चार साल के बच्चे की हिरासत को लेकर चल रहे विवाद में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पिता और उसके परिवार की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा है।

सिंगल बेंच ने बच्चे की कस्टडी उसकी मां को सौंपने का निर्देश दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता की बेहतर आर्थिक स्थिति या बच्चे के नाम किए गए निवेश मां की व्यक्तिगत और भावनात्मक देखभाल का स्थान नहीं ले सकते।

जस्टिस सुवीर सहगल और जस्टिस राजेश गौड की खंडपीठ के समक्ष फरीदाबाद निवासी मां ने बताया कि उसका विवाह सितंबर 2018 में हुआ था और अप्रैल 2022 में बच्चे का जन्म हुआ।

वैवाहिक विवाद के बाद 15 मार्च 2025 को उसे बच्चे को उससे अलग कर दिया गया। इसके बाद उसे ससुराल में प्रवेश करने और बच्चे की हिरासत लेने की अनुमति नहीं दी गई।

मां ने मांगी बच्ची की अभिरक्षा

मां ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से बच्चे की हिरासत मांगी थी। एकल पीठ ने 20 अगस्त 2026 को मां की याचिका स्वीकार करते हुए बच्चे को उसकी हिरासत में देने का आदेश दिया था।

इसके खिलाफ पिता और उसके परिवार ने खंडपीठ में अपील की थी। पिता की ओर से तर्क दिया गया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए माता-पिता के बीच बच्चे की हिरासत का विवाद नहीं निपटाया जा सकता और मां को दीवानी अदालत का रुख करना चाहिए।

मां के पास होनी चाहिए अभिरक्षा: हाई कोर्ट

खंडपीठ ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि नाबालिग की हिरासत के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका विचारणीय हो सकती है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की अभिरक्षा सामान्यतः मां के पास होनी चाहिए।

हालांकि, इसमें इस्तेमाल किया गया शब्द ‘सामान्यतः’ अदालत को परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार देता है। हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है और माता-पिता के अधिकार भी उसके हित के अधीन हैं।

अदालत के अनुसार, जब तक मां को बच्चे की देखभाल के लिए अयोग्य, अनैतिक या असमर्थ साबित न किया जाए, इतने छोटे बच्चे की हिरासत सामान्यतः मां को दी जानी चाहिए। पिता की आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति या उसके निवेश चार साल के बच्चे के लिए मां की जैविक और भावनात्मक देखभाल की जरूरत को पूरा नहीं कर सकते।