विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

109 KG गांजा बरामदगी मामले में आरोपी की जमानत खारिज, हाई कोर्ट ने कहा- आर्टिकल 21 जरूरी लेकिन NDPS एक्ट सख्त

Published: Sat, 03 Oct 2026 01:59 PM (IST)

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 109 किलोग्राम गांजा बरामदगी मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण है।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट फाइल फोटो

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट फाइल फोटो

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने 109 किलोग्राम गांजा बरामदगी मामले में जमानत देने से इनकार किया

  2. एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 की कठोर शर्तें वाणिज्यिक मात्रा पर लागू होती हैं

  3. त्वरित सुनवाई का अधिकार धारा 37 की शर्तों को कमजोर नहीं कर सकता

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 109 किलोग्राम गांजा बरामदगी के मामले में आरोपित को जमानत देने से इन्कार कर दिया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस) की धारा 37 में निर्धारित कठोर शर्तों को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता। वाणिज्यिक मात्रा के मामलों में जमानत पर फैसला करते समय अदालत को धारा 37 की अनिवार्य शर्तों का पालन करना होगा। यह रुख हाल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी स्पष्ट किया गया है।

मामला हरियाणा के पलवल में 109 किलोग्राम गांजा बरामदगी से जुड़े एनडीपीएस मामले का है। आरोपित की ओर से जमानत के लिए दलील दी गई कि वह लंबे समय से हिरासत में है और मुकदमे में देरी होने के कारण उसका संविधान के अनुच्छेद 21 में मिला त्वरित सुनवाई का अधिकार प्रभावित हो रहा है।

आरोपित पक्ष ने इसी आधार पर जमानत की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने मामले में बरामद मादक पदार्थ की मात्रा को गंभीरता से लेते हुए धारा 37 के प्रावधानों को लागू माना।

गांजा की 20 किलोग्राम से अधिक मात्रा वाणिज्यिक मात्रा की श्रेणी में आती है। ऐसे मामलों में सामान्य जमानत प्रविधानों के बजाय एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 की विशेष शर्तें लागू होती हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वाणिज्यिक मात्रा के मामले में जमानत देने से पहले अदालत को यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि आरोपी के दोषी नहीं होने के विश्वास के लिए उचित आधार मौजूद हैं और जमानत पर बाहर आने के बाद उसके दोबारा किसी अपराध में शामिल होने की संभावना नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबी हिरासत अपने आप जमानत का आधार नहीं बन सकती, खासकर तब जब मामला वाणिज्यिक मात्रा से जुड़ा हो और धारा 37 की अनिवार्य शर्तें पूरी न होती हों।