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 पंचकूला में सिंथेटिक ट्रैक्स की ‘गुणवत्ता’ 6 महीले में ही बेनकाब, घटिया सामग्री लगी या निगरानी में चूक?

Published: Sat, 12 Sep 2026 04:14 PM (IST)

पंचकूला के पार्कों में बने सिंथेटिक ट्रैक छह महीने में ही खराब होने लगे हैं, जिससे उनकी गुणवत्ता पर गंभीर ...और पढ़ें

सिंथेटिक ट्रैक जगह-जगह से टूटने और उखड़ने लगे हैं। (सांकेतिक फोटो)

सिंथेटिक ट्रैक जगह-जगह से टूटने और उखड़ने लगे हैं। (सांकेतिक फोटो)

HighLights

  1. -शिकायतों के बाद भी नहीं हो रहा हल।

  2. टूटे सिंथेटिक ट्रैक्स पर चलने में समस्या।

  3. लोगों ने जांच और कार्रवाई की मांग की।


राजेश मलकानियां, पंचकूला। शहर के पार्कों में लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए नगर निगम की ओर से बनाए गए सिंथेटिक ट्रैक अब अपनी गुणवत्ता की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। फरवरी-मार्च में बनाए गए कई सिंथेटिक ट्रैक महज छह महीने के भीतर ही जगह-जगह से टूटने और उखड़ने लगे हैं।

इससे निर्माण कार्य में इस्तेमाल सामग्री की गुणवत्ता और संबंधित विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सेक्टर-9 और 10 के कई पार्कों में ट्रैक की हालत देखकर लोगों में रोष है। सेक्टर-10 में मकान नंबर 380 के सामने पार्क नंबर 1006 और मकान नंबर 616 के सामने पार्क नंबर 1007 में सिंथेटिक ट्रैक कई जगह से क्षतिग्रस्त हो चुका है।

सेक्टर-9 में मकान नंबर 398 के सामने पार्क नंबर 912 और मकान नंबर 119 के सामने पार्क नंबर 910 में भी ट्रैक टूटने की शिकायतें सामने आई हैं। लोगों का कहना है कि इन ट्रैक्स के निर्माण पर सरकारी खजाने से पैसा खर्च किया गया है।

यदि नया ट्रैक बनने के छह महीने के भीतर ही उसकी ऊपरी परत टूटने लगे और जगह-जगह से खराब हो जाए तो यह सीधे तौर पर निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है। लोगों का आरोप है कि शिकायतें अधिकारियों तक पहुंचाने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।

इतने कम समय में खराब कैसे हो गए?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए ट्रैक इतने कम समय में खराब कैसे हो गए। क्या निर्माण के दौरान निर्धारित मानकों के मुताबिक सामग्री का इस्तेमाल किया गया था? क्या काम पूरा होने के बाद विभाग ने इसकी तकनीकी जांच की थी? यदि जांच हुई थी तो फिर छह महीने में ही ट्रैक की यह हालत कैसे हो गई?

लोगों की मांग- सिर्फ पैबंद नहीं, हो पूरी जांच

स्थानीय लोगों का कहना है कि टूटे हुए ट्रैक पर केवल पैबंद लगाकर मामले को खत्म नहीं किया जाना चाहिए। पहले यह पता लगाया जाए कि ट्रैक क्यों टूटे और किस स्तर पर खामी हुई। इसके बाद खराब ट्रैक्स की वैज्ञानिक तरीके से मरम्मत या जरूरत पड़ने पर पुनर्निर्माण कराया जाए।