जेएनएन, चंडीगढ़। दलबदल कानून के दायरे में आ रहे जननायक जनता पार्टी समर्थक इनेलो के चार विधायकों नैना चौटाला, अनूप धानक, राजदीप फौगाट और पिरथी नंबरदार को अब 20 अगस्त तक विधानसभा अध्यक्ष कंवरपाल गुर्जर के सामने जवाब देना होगा। इस मामले में उन्हें मंगलवार को जवाब देना था। मगर दो दिन पहले ही नैना चौटाला की सास व पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला की पत्नी स्नेहलता का निधन हो गया। नैना सिंह चौटाला ने विस अध्यक्ष को भेजे पत्र में कहा कि सास के निधन की वजह से वे अभी रिप्लाई नहीं दे सकती।

याचिका का जवाब तैयार करने के लिए उन्हें वकील भी करना है। ऐसे में उन्हें रिप्लाई के लिए चार सप्ताह का समय दिया जाए। बाकी तीन विधायकों ने भी कहा कि इनेलो सुप्रीमो की धर्मपत्नी का निधन होने की वजह से वे अभी जवाब नहीं दे सकते। इस पर विस अध्यक्ष ने जवाब देने के लिए 20 अगस्त तक का समय दिया है। वहीं 27 अगस्त से बहस शुरू होगी। बहस के बाद विस अध्यक्ष फैसला सुनाएंगे।

इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला ने उक्त चारों विधायकों के खिलाफ विस अध्यक्ष की कोर्ट में याचिका दायर कर दलबदल कानून के तहत उनकी सदस्यता रद करने की मांग कर रखी है। वहीं झिरका से इनेलो विधायक रहे नसीम अहमद के खिलाफ भी अलग से याचिका दायर की हुई है। नसीम को रिप्लाई के लिए विस अध्यक्ष पहले ही चार सप्ताह का समय दे चुके हैं। इस बीच नसीम अहमद विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा ज्वाइन कर चुके हैं। विस अध्यक्ष कंवरपाल गुर्जर उनका इस्तीफा भी मंजूर कर चुके हैं।

अभय चौटाला की याचिका पर चारों विधायकों को नोटिस जारी करने के बाद स्पीकर ने मामले की सुनवाई के लिए 6 अगस्त निर्धारित की थी। मानसून सत्र की वजह से सुनवाई नहीं हो सकी। इसके बाद नोटिस जारी कर 13 अगस्त को सुनवाई तय की गई थी।

हुड्डा सरकार के फैसले की बदौलत बरकरार रहेंगी सुविधाएं

अगर विस अध्यक्ष उक्त विधायकों की सदस्यता रद भी कर देते हैं तो उनके पेंशन-भत्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वह पूर्व विधायकों को मिलने वाली सभी सुविधाओं के हकदार रहेंगे। विधायकों व पूर्व विधायकों के वेतन एवं पेंशन-भत्तों से जुड़े कानून में पूर्व की हुड्डा सरकार ने संशोधन किया था। पहले यह प्रावधान था कि अगर जनप्रतिनिधित्व कानून या अन्य किसी भी कानून और धारा के तहत अगर विधायकों की सदस्यता रद होती है तो उन्हें पेंशन-भत्ते नहीं मिलेंगे। हुड्डा सरकार ने 2007 में एक्ट नंबर-10 में संशोधन करते हुए अन्य कानूनों की वजह से सदस्यता जाने को इससे बाहर कर दिया। यह संशोधन भी पहली मार्च 1991 से लागू किया गया।

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Posted By: Kamlesh Bhatt