6 बच्चों की मां, 2 बच्चों का बाप... लिव-इन की सुरक्षा मांगने पहुंचे हाई कोर्ट, जज साहब ने क्या सुनाया फैसला?
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पलवल के एक विवाहित जोड़े की सुरक्षा याचिका खारिज कर दी, जो अपने परिवारों की इच्छा के विरुद्ध साथ रह रहे थे।
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आठ बच्चों के माता-पिता ने मांगी प्रेम संबंधों के लिए सुरक्षा, हाई कोर्ट ने याचिका ठुकराई।
HighLights
पलवल के विवाहित जोड़े की सुरक्षा याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की
अदालत ने इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया
बच्चों और वैध जीवनसाथियों के अधिकारों को भी महत्व दिया
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पलवल निवासी आठ बच्चों के माता-पिता विवाहित महिला और पुरुष की ओर से दायर सुरक्षा याचिका खारिज कर दी। दोनों अलग-अलग लोगों से पहले से विवाहित हैं और परिवार की इच्छा के विरुद्ध एक साथ रह रहे थे। महिला के छह और पुरुष के दो बच्चे हैं। दोनों ने स्वजन से जान का खतरा बताते हुए पुलिस सुरक्षा की मांग की थी।
जस्टिस आलोक जैन ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता कथित खतरे के संबंध में कोई ठोस और विशिष्ट आधार प्रस्तुत नहीं कर सके। अदालत ने कहा कि याचिका प्रथम दृष्टया कानूनी प्रक्रिया की आड़ में उनके संबंध को संरक्षण देने का प्रयास प्रतीत होती है।
ऐसी स्थिति कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान है। पलवल निवासी दोनों याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया था कि वे बालिग हैं और परिवार की इच्छा के विरुद्ध साथ रह रहे हैं। उनका आरोप था कि इसके चलते उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं और वे अपने-अपने घर वापस जाने की स्थिति में नहीं हैं।
जांच में भी सामने नहीं आया वास्तविक खतरा
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पुरुष पहले से विवाहित है और उसके दो बच्चे हैं। महिला भी विवाहित है और उसके छह बच्चे हैं। शिकायत मिलने के बाद संबंधित लोगों और ग्रामीणों के बयान दर्ज किए गए थे, लेकिन जांच के दौरान किसी वास्तविक खतरे की पुष्टि नहीं हुई।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है। राज्य का दायित्व है कि वह नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे। हालांकि, इस संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कानून के शासन को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता।
बच्चों और वैध जीवनसाथियों के अधिकार भी महत्वपूर्ण
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल याचिकाकर्ताओं के अधिकारों पर विचार नहीं किया जा सकता। उनके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को उनके वैध जीवनसाथियों तथा बच्चों के सम्मानजनक जीवन के अधिकार के साथ संतुलित करके देखना होगा।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मात्र सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पुलिस सुरक्षा का आदेश नहीं दिया जा सकता। मौजूदा मामले में ऐसा कोई ठोस खतरा सामने नहीं आया, जिसके आधार पर राज्य को सुरक्षा देने का निर्देश दिया जा सके।
सुरक्षा देने से सामाजिक ताने-बाने पर असर
अदालत ने माना कि मौजूदा परिस्थितियों में मांगी गई पुलिस सुरक्षा प्रदान करना उचित नहीं होगा। ऐसी सुरक्षा का आदेश परिवार और बच्चों के अधिकारों सहित व्यापक सामाजिक परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है। इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने दोनों की याचिका खारिज कर दी।
