दोस्त की बीवी पर नीयत खराब, पत्नी और जिगरी यार का किया कत्ल; पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने बरकरार रखी उम्रकैद
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने दोस्त और अपनी पत्नी की हत्या के दोषी मोहन लाल की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट फाइल फोटो
HighLights
मोहन लाल की उम्रकैद की सजा हाई कोर्ट ने बरकरार रखी
दोस्त और अपनी पत्नी की हत्या का दोषी पाया गया
दोस्त की पत्नी से शादी करने की थी उसकी चाहत
राज्य ब्यूराे, चंडीगढ़। अपने दोस्त की पत्नी से शादी करने की चाह में दोस्त और अपनी पत्नी की हत्या करने के दोषी मोहन लाल की उम्रकैद की सजा पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बरकरार रखी है।
21 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में हाई कोर्ट ने मोहन लाल की अपील खारिज करते हुए सिरसा की अतिरिक्त सत्र अदालत के फैसले को कायम रखा। जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियां मिलकर पूरी श्रृंखला बनाती हैं।
दोस्त की पत्नी थी रमन, जिससे शादी करना चाहता था मोहन लाल
मामले में मृतक भजन लाल की शादी रमन से 11 अगस्त 2002 को हुई थी। मोहन लाल और भजन लाल के बीच करीबी संबंध थे और दोनों एक-दूसरे के घर आते-जाते थे। मोहन लाल की शादी संतोष रानी से हुई थी। अभियोजन के अनुसार मोहन लाल भजन लाल की पत्नी रमन से शादी करना चाहता था।
घटना 18-19 जनवरी 2003 की रात की है। भजन लाल रात को घर नहीं लौटा। अगले दिन सुबह जब उसका भाई प्रेम चंद और पिता करम चंद मोहन लाल के घर पहुंचे तो उसने बताया कि उसकी पत्नी संतोष रानी का शव घर में और भजन लाल का शव उसकी दुकान में पड़ा है।
मोहन लाल ने दावा किया कि दोनों ने जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली। उसने कहा कि उसने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देखा था और बदनामी के डर से पुलिस को सूचना नहीं दी गई। इसके बाद दोनों शवों का अलग-अलग अंतिम संस्कार कर दिया गया।
मृतक के नाम से लिखे पत्रों से खुला राज
कुछ दिन बाद मोहन लाल ने भजन लाल के नाम से लिखा एक पत्र उसके परिवार को सौंपा। इसमें रमन से मोहन लाल की शादी की इच्छा जताई गई थी। इन पत्रों की हस्तलेख जांच कराई गई। विधि विज्ञान प्रयोगशाला और हस्तलेख विशेषज्ञों ने पत्रों की लिखावट को मोहन लाल की लिखावट से एक ही व्यक्ति की लिखावट बताया।
हाई कोर्ट ने कहा कि भजन लाल और संतोष रानी के बीच किसी अवैध संबंध का स्वतंत्र प्रमाण रिकार्ड पर नहीं था। दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देखने की कहानी मोहन लाल की ओर से बताई गई थी।
अदालत ने मोहन लाल की निशानदेही पर बरामद इंसुलिन की शीशी, सिरिंज और अन्य सामान को भी महत्वपूर्ण परिस्थिति माना। विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट में शीशी में इंसुलिन होने की पुष्टि हुई।
पीठ ने पत्रों की लिखावट, आरोपी की ओर से बताई गई आत्महत्या की कहानी, दोनों शवों की स्थिति, अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति और इंसुलिन की बरामदगी सहित सभी परिस्थितियों को एक साथ देखा। अदालत ने पाया कि ये परिस्थितियां एक-दूसरे से जुड़ती हैं और निचली अदालत की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
2005 की उम्रकैद पर हाई कोर्ट की मुहर
सिरसा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने 27 सितंबर 2005 को मोहन लाल को दोषी ठहराया था। 29 सितंबर 2005 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत उम्रकैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। धारा 201 के तहत छह महीने की कैद और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा भी दी गई थी। हाई कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा दोनों बरकरार रखीं।
