दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता के बयानों पर प्रमुखता से विचार किया जाना चाहिए, लेकिन इन बयानों के आधार पर सभ्य समाज में किसी को भी झूठा फंसाया या दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि अगर पीड़िता के मजिस्ट्रेट के सामने व पुलिस अधिकारियों को दिए गए बयानों को सच मान लिया जाने लगा तो यह बयान एक व्यक्ति को सलाखों के पीछे डालने और उसे दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त होंगे। उस स्थिति में यह न्याय का उपहास होगा और मुकदमा चलाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी, इसलिए पीड़िता के आरोपों की तार्किक व तथ्यों पर गहराई से जांच होनी चाहिए, ताकि कोई बेकसूर सजा का पात्र न बन पाए।

हाई कोर्ट के जस्टिस जीएस संधावालिया और जस्टिस जगमोहन बंसल की खंडपीठ ने हरियाणा के रेवाड़ी जिले की एक लड़की की याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिए हैं। इस मामले में अपीलकर्ता लड़की की शिकायत पर छेड़छाड़ व दुष्कर्म के आरोप में 19 सितंबर 2017 को पुलिस स्टेशन कोसली (रेवाड़ी) में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

हाई कोर्ट में दायर अपील में उसने एक मई, 2019 के फैसले को रद करने की मांग की, जिसके तहत अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रेवाड़ी ने सेना के एक जवान को इस आधार पर बरी कर दिया था कि अभियोजन पक्ष आरोपित के अपराध को साबित करने में विफल रहा है।

लड़की की आरोपित से हुई थी सगाई

अपीलकर्ता लड़की की आराेपित लड़के के साथ सगाई हुई थी और यह घटना सगाई के बाद हुई बताई गई थी। लड़की के अनुसार नौ अगस्त 2017 को वह अपने परिवार की अनुमति के बाद आरोपित (मंगेतर) से मिली थी। आरोपित उसे अपनी बाइक पर बीकेडी स्कूल के पास कोसली रोड पर ले गया, जहां उसने छेड़खानी की।

लड़की के आरोप सही नहीं हुए साबित

लड़की के अनुसार, उसने लड़के से कहा कि वह शादी तक उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित नहीं करेगी, लेकिन लड़का नाराज हो गया। वह न केवल उसे मारने की धमकी देने लगा, बल्कि उससे शादी नहीं करने की धमकी तक दे डाली। मामला दर्ज होने के बाद आरोपित सेना के जवान को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता लड़की द्वारा लगाए गए आरोप साबित नहीं हो सके।

निचली अदालत के आदेशों के लड़की ने दी थी चुनौती

निचली अदालत ने युवक को यह कहते हुए बरी कर दिया गया कि उसे दोषी ठहराना न तो उचित होगा और न ही न्याय के हित में क्योंकि उसके खिलाफ कोई भी ठोस सबूत नहीं है। निचली अदालत के इस आदेश को चुनौती देने के लिए लड़की ने हाई कोर्ट में अपील दायर की।

हाई कोर्ट ने की ये टिप्पणी

लड़की ने लड़के को सजा देने और ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद करने की मांग की। अपील पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने देखा कि घटना की जगह एक सार्वजनिक स्थान है और यह अस्पताल, पुलिस स्टेशन और व्यस्त सड़क से घिरा हुआ है। यह विश्वास करना कठिन है कि एक व्यक्ति जो भारतीय सेना में काम कर रहा है, एक सार्वजनिक स्थान पर किसी लड़की के साथ यौन अपराध करेगा और वह भी तब, जब लड़का पहली बार अपनी होने वाली पत्नी से मिला हो। लड़की की अपील को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला तर्कपूर्ण है और अभियोजन पक्ष के आरोपों में कोई दम नहीं है।

Edited By: Kamlesh Bhatt

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