चंडीगढ़, [अनुराग अग्रवाल]। देशभर में एक बहस छिड़ी हुई है कि लोकसभा और विधानसभा में कानून बनाने वाले हमारे माननीय पढ़े लिखे होने चाहिए। भाजपा शासित राज्यों में शामिल हरियाणा में मनोहर सरकार पिछले पंचायत चुनाव में पढ़ी लिखी शासन व्यवस्था का सफल प्रयोग कर चुकी है। इसको लेकर हरियाणा सरकार ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर पहल की है। इस पहल पर सुप्रीम कोर्ट तक ने भी एक तरह से मुहर लगाई है। इसके समर्थन और विरोध के बीच बड़ा सवाल है कि यदि पंचायत प्रतिनिधि पढ़े-लिखे होने चाहिए तो सांसद व विधायकों के लिए भी यह प्रावधान क्‍यों नहीं हो।

एमपी-एमएलए की शैक्षिक योग्यता तय करने वाले मनोहर के पत्र से छिड़ी नई बहस

हरियाणा की पहल‍के बाद अब बाकी राज्य भी उसके नक्शे-कदम पर चलने का साहस जुटाने की कोशिश में है। नया मुद्दा पढ़े लिखे विधायकों और सांसदों के चयन का है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विधायकों व सांसदों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित करने का पत्र लिखकर पूरे देश में छिड़ी बहस को हवा देने का काम किया है।

हरियाणा कर चुका पंचायत चुनाव में सफल प्रयोग, अब फिर झंडा थामने की तैयारी

विधायकों के लिए स्नातक और सांसदों के लिए स्नातकोत्तर तक पढ़ाई जरूरी करने का प्रस्ताव है। मुख्यमंत्री के इस प्रस्ताव पर कितना और कब अमल होता है, यह भविष्य का सवाल है, लेकिन पढ़ी लिखी विधायिका के हक और विरोध में स्वर मुखर होने लगे हैं।

पहले हरियाणा की ही बात करते हैं। 90 सदस्यीय विधानसभा में 30 विधायक ऐसे हैं, जो स्नातक तक पढ़ाई के खांचे में फिट नहीं बैठते। इनमें आधा दर्जन मंत्री भी शामिल हैं। 17 विधायक 12वीं पास, आठ विधायक 10वीं पास और चार विधायक मात्र आठवीं पास हैं। एक विधायक तो ऐसा भी है, जो अंगूठा टेक यानी पूरी तरह से निरक्षर है। दो विधायक डाक्ट्रेट और 12 विधायक स्नातकोत्तर भी हैं। यानी सब कुछ धुंधला-धुंधला ही नहीं है।

यह रहा विधायकों-सांसदों का नजरिया

सवाल उठता है कि यदि विधायकों और सांसदों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित कर दी गई तो इसका असर क्या होगा। हम पहले बात करते हैं राजनीतिक लोगों की। इस व्यवस्था के लागू होने का सबसे बड़ा नुकसान टिकट के दावेदार नेताओं को है। अगर यह सिस्टम अगली बार से ही लागू होता है तो राज्य के 30 विधायकों का टिकट कटना तय है।

ऐसे में ये विधायक किसी सूरत में नहीं चाहेंगे कि पढ़ी लिखी शासन व्यवस्था की परिपाटी शुरू हो सके। यह तो रही मौजूदा विधायकों की बात। अब उन लोगों की भी चिंता कर लें जो हर पांच साल में चुनाव आने का इंतजार करते हैं और टिकट के लिए दावेदारी करते हैं। टिकट के तलबगार अगर ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट हैं तो उनकी दावेदारी को बल मिलेगा वरना उन्हें टिकट की दौड़ से खुद को बाहर मानकर अपने लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी।

जनता के नजरिए से सोचना भी जरूरी

मुख्यमंत्री के पत्र का दूसरा पहलू आम लोगों के लिए पारदर्शी और बढिय़ा सिस्टम खड़ा करने से जुड़ा है, जहां भ्रष्टाचार का कोई नामो-निशान न हो। इसके लिए लोकसभा और विधानसभा में पढ़े लिखे जनप्रतिनिधियों का पहुंचना जरूरी है। ऐसा तभी होगा, जब राजनीतिक जुगाड़ के जरिए टिकट हथियाने वाले पुराने नेताओं को साइड लाइन कर नई पीढ़ी के पढ़े लिखे राजनीतिक समझ वाले युवाओं अथवा लोगों को विधायिका में जाने का मौका मिलेगा। फिर अधकचरे कानून बनाने का डर नहीं रहेगा।

धनखड़ ने मनोहर को मनाया और मनोहर अब मोदी को कर रहे तैयार

हरियाणा के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने कहा कि पंचायत चुनाव में शैक्षिक योग्यता का फार्मूला लागू कर पूरे देश के सामने शानदार नजीर पेश की है। उन्होंने सबसे पहले मुख्यमंत्री मनोहर लाल को भरोसे में लिया और मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री का विश्वास जीता। इसका नतीजा यह हुआ कि हरियाणा में अब पंचायत व्यवस्था पढ़े लिखे नए लोगों के हाथों में है।

राज्‍य में पंचायत चुनाव में सामान्य वर्ग के पुरुषों लिए दसवीं पास, महिलाओं के लिए आठवीं पास, दलितों के लिए आठ और दलित महिलाओं के लिए पांचवीं पास होने की शर्त अब बाकी राज्यों में चर्चा का अहम बिंदु बन गई है। हरियाणा में बर्गर किंग पंचायत का चुनाव जीती तो कारपोरेट कंपनी में काम करने वाली युवती भी सरपंच बनी।

विधानसभा में यह है पढ़े लिखों का बही खाता

हरियाणा की 90 सदस्यीय विधानसभा में 60 एमएलए ही ग्रेजुएट या इसके समकक्ष डिग्री वाले अथवा अधिक पढ़े लिखे हैं। 30 विधायक ऐसे हैं, जिनकी शैक्षिक योग्यता 12वीं या इससे कम है। 90 विधायकों में 25 बीए, 17 विधायक 12वीं पास, 20 ग्रेजुएट बिजनेसमैन, 12 एमए, चार आठवीं पास, एक पांचवीं पास, आठ विधायक दसवीं पास और दो विधायक पीएचडी हैं।

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हरियाणा के अंडर ग्रेजुएट विधायक और मंत्री

1. परिवहन एवं आवास मंत्री कृष्णलाल पंवार - दसवीं पास और बायलर कंपेटेंसी डिप्लोमा।
2. असंध के भाजपा विधायक एवं पूर्व सीपीएस बख्शीश सिंह विर्क - दसवीं पास।
3. कालांवाली के अकाली दल (बादल) विधायक बलकौर सिंह - दसवीं पास। 
4. पटौदी से भाजपा विधायक बिमला चौधरी - पांचवीं पास।
5. भाजपा विधायक दल के मुख्य सचेतक एवं पंचकूला के विधायक ज्ञानचंद गुप्ता - 12वीं पास।
6. जींद से इनेलो विधायक हरिचंद मिड्डा - दसवीं पास।
7. खरखौदा से कांग्रेस विधायक जयवीर वाल्मीकि - 12वीं पास।
8. विधानसभा में इनेलो विधायक दल के उपनेता एवं पेहवा से विधायक जसविंद्र सिंह संधू - दसवीं।
9. गुहला से भाजपा विधायक कुलवंत बाजीगर - 12वीं पास।
10. कलानौर से कांग्रेस विधायक शकुंतला खटक - 12वीं पास और नर्सिंग का डिप्लोमा।
11. बरौदा से कांग्रेस विधायक श्रीकृष्ण हुड्डा - अंडर मैट्रिक।
12. सिरसा से इनेलो विधायक मक्खन सिंगला - आठवीं से कम पढ़े।
13. सहकारिता मंत्री एवं रोहतक से भाजपा विधायक मनीष ग्रोवर - 12वीं पास।
14. नरवाना से इनेलो विधायक पृथ्वी सिंह - आठवीं पास।
15. दादरी से इनेलो विधायक राजदीप फौगाट - 12वीं पास।
16. रानियां से इनेलो विधायक रामचंद्र कांबोज - 12वीं पास।
17. नलवा से इनेलो विधायक एवं पूर्व सांसद रणबीर गंगवा - 12वीं पास।
18. समालखा से आजाद विधायक रवींद्र मछरौली - दसवीं पास।
19. सोहना से भाजपा विधायक तेजपाल तंवर - 12वीं पास।
20. पृथला से बसपा विधायक टेक चंद शर्मा - प्री-यूनिवर्सिटी एवं डिप्‍लोमा।

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पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल की पहल से नहीं हैं सहमत।

सिस्टम सुधरेगा, भ्रष्टाचार में आएगी भारी कमी

'' हमने पंचायत चुनाव में पढ़े लिखे प्रतिनिधि देने का प्रयोग किया, जो बेहद सफल रहा। आज देश के बाकी राज्य भी हरियाणा का अनुसरण करने को तैयार हैं। पढ़ी लिखी पंचायतों के आने से न केवल भ्रष्टाचार कम हुआ बल्कि पारदर्शिता आई। अब हमने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी शैक्षिक योग्यता निर्धारित करने का सुझाव दिया है। इससे पूरे सिस्टम में सुधार होगा। अंतिम फैसला केंद्र सरकार को लेना है।

                                                                                                   - मनोहर लाल, मुख्यमंत्री, हरियाणा।

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'अगुवाई करने के लिए पढ़ा लिखा होना जरूरी नहीं'

'' जनता की अगुवाई करने के लिए पढ़ा लिखा होना जरूरी नहीं है। जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की लड़ाई लड़ी, वे सभी पढ़े लिखे नहीं थे, लेकिन उनमें देश को आगे ले जाने और आजाद कराने का जज्बा था। पहले सीएम खुद अपनी शैक्षिक योग्यता बताएं। राज्य के विकास व अन्य ज्वलंत समस्याओं के समाधान की बजाए फिर से नारे-जुमले देकर सुर्खियां बटोरना अब ज्यादा दिन नहीं चलेगा। ताऊ देवीलाल समेत हजारों ऐसे नेता रहे, जो कम पढ़े-लिखे थे मगर देश में लोकप्रिय थे। अभी देश में 100 फीसद साक्षरता दर नहीं है। ऐसे में मुख्यमंत्री की यह मांग वाजिब नहीं है।

                                                                                       - भूपेंद्र हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री, हरियाणा।

 

Posted By: Sunil Kumar Jha