चंडीगढ़ [अनुराग अग्रवाल]। धारा के विपरीत बहने वाला व्यक्ति या अधिकारी जब धारा के अनुकूल बहता दिखाई दे तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। जी हां, हम बात कर रहे हरियाणा के सीनियर आइएएस अधिकारी डा. अशोक खेमका (Ashok Khemka) की। खेमका के सेवाकाल में कोई सरकार ऐसी नहीं रही, जिसमें उनका मुख्यमंत्रियों से पंगा न हुआ हो।

मौजूदा भाजपा सरकार में भी खेमका का कई बार पंगा हो चुका है। यह पहला मौका है, जब खेमका तीन कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए आंदोलनकारियों से सवाल करते नजर आए। खेमका ने पूछा कि जब खुले बाजार में सरसों व सूरजमुखी के दाम ज्यादा मिल रहे हैं तो फिर इन कानूनों में काला क्या है? खेमका के इस सवाल पर सरकार खुश है? और हैरान भी। खुश इसलिए कि चलो, खेमका ने कोई अच्छी बात कही। हैरान इसलिए कि ऐसा खेमका ने कहा क्यों? लोग अनुमान लगा रहे हैं कि खेमका कहीं खेमा तो नहीं बदलने वाले।

रिश्ता है तेरा-मेरा सबसे आला

हर मां का अपने बेटे से वही रिश्ता होता है, जो कौशल्या का राम से था। यशोदा का श्याम से था। जो ईसा का मरियम से था। जो हसन और हुसैन का फातिमा से था। एक फिल्म आई थी, जय विक्रांता। उसके एक गाने में मां और पुत्र के रिश्ते को बड़ी खूबसूरती से रेखांकित किया गया था। इस रिश्ते की एक मिसाल अभी हाल ही में पेश की अंतरराष्ट्रीय पहलवान एवं महिला बाल विकास निगम की चेयरपर्सन बबीता फौगाट ने। कृषि कानून विरोधी आंदोलनकारियों ने हमला कर दिया। किसी तरह से बबीता ने खुद को और अपने नन्हे बेटे को बचाया। उसके बाद स्टील लेडी बबीता ने भरी आंखों से आंदोलनकारियों के बारे मे जमकर खरी-खरी सुनाई। बोलीं- ये किसान नहीं हैं। किसान बहन-बेटियों पर हाथ नहीं उठाते। मेरे छोटे से बच्चे को कुछ हो जाता तो, अब आंदोलनकारियों के पास मुंह छिपाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रहा।

मौनं स्वीकार लक्षणं

हरियाणा में छह माह से चल रहे किसान जत्थेबंदियों के आंदोलन पर जाट पालिटिक्स हावी है। शुरू में तो लगा कि किसान जत्थेबंदियां वास्तव में कृषि कानूनों का विरोध कर रही हैं, लेकिन वार्ता के कई दौर के बाद भी पहले कानून वापस लेने की जिद साफ संकेत कर रही कि आंदोलन के पीछे राजनीतिक मंशा भी छिपी है। एक टीवी चैनल पर भाकियू नेता राकेश टिकैत ने किसी से सीधे यह सवाल कर लिया कि कहीं यह आंदोलन जाट पालिटिक्स से प्रभावित तो नहीं होता जा रहा है। इस सवाल पर टिकैत थोड़ा ठिठके। फिर बोले, कि मुझे तो नहीं लगता, लेकिन ऐसी सूचनाएं मेरे पास आई हैं कि इस आंदोलन को एक खास वर्ग का आंदोलन बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह प्रयास कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है, इस पर बिना की टीका-टिप्पणी किए टिकैत मौन साध गए। जाहिर है-मौनं स्वीकार लक्षणं।

बुजुर्ग वृक्षों को मनोहर पेंशन

हमारी परंपरा में कृतज्ञता-ज्ञापन रचा बसा है। पेड़ों की पूजा होती है। नदियों को मां कहकर बुलाया जाता है। ऐसा इसलिए नदियां जीवनधारा हैं। पेड़ फल और प्राणवायु दोनों देते हैं। बिश्नोई समाज के संत गुरु जंभेश्वर ने पेड़ों की सुरक्षा और संरक्षा पर विशेष बल दिया है। लगता है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल भी गुरु जंभेश्वर से प्रभावित हैं। होना भी चाहिए। अच्छी सोच तो सबके लिए अच्छी होती है। सो, अपनी इसी सोच के कारण मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने ऐसा काम कर दिखाया जो इसके पहले किसी ने नहीं किया था। चौधरी देवीलाल ने जिस तरह राज्य में लोगों को पेंशन देनी शुरू की थी, उसी तरह मनोहर लाल ने अब लोगों को प्रकृति से जोड़ने के लिए 75 साल से अधिक आयु वाले वृक्षों को पेंशन देना तय किया है। इसके तहत बुजुर्ग वृक्षों के रखरखाव के लिए उनके मालिकों को ढाई हजार रुपये मिलेंगे।

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