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आठ साल के निलंबन के बाद हरियाणा की शिक्षिका को मिलेगा पूरा वेतन और लाभ, हाई कोर्ट का फैसला

Published: Tue, 13 Oct 2026 04:37 PM (IST)

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा की एक शिक्षिका रचना गुप्ता की आठ साल से अधिक की निलंबन अवधि को ड्यूटी मानने का आदेश दिया है।

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HighLights

  1. निलंबन अवधि को ड्यूटी मानने का हाई कोर्ट का आदेश।

  2. शिक्षिका रचना गुप्ता को मिलेगा पूरा वेतन और लाभ।

  3. आपराधिक मामले में बरी होने पर सरकार को झटका।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार के पालीटेक्निक संस्थान की वरिष्ठ व्याख्याता (शिक्षिका) रचना गुप्ता की आठ साल से अधिक की निलंबन अवधि को ड्यूटी मानने का आदेश दिया है।

अदालत ने कहा कि आपराधिक मामले में बरी होने और विभागीय आरोपपत्र वापस लिए जाने के बाद सरकार उन्हें वेतन लाभ से वंचित नहीं कर सकती। निर्वाह भत्ते की राशि समायोजित कर पूरा वेतन-भत्ता, छह प्रतिशत सालाना ब्याज और अन्य सेवा लाभ देने होंगे।

न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार का 20 दिसंबर 2022 का आदेश रद कर दिया।

उस आदेश में 26 जून 2014 से दो जनवरी 2023 तक की निलंबन अवधि को अर्जित छुट्टी में समायोजित किया गया था। वित्तीय लाभ याचिका दायर करने की तारीख से तीन महीने के भीतर जारी करने का निर्देश दिया गया है।

प्रमाणपत्र को फर्जी बताया

रचना गुप्ता सितंबर 2003 में हरियाणा लोक सेवा आयोग के माध्यम से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की वरिष्ठ व्याख्याता नियुक्त हुई थीं। नियुक्ति के समय उन्होंने करनाल के एक कालेज में 24 जुलाई 1995 से 30 सितंबर 1996 तक काम करने का अनुभव प्रमाणपत्र दिया था, जिसे फर्जी बताया गया।

राज्य सतर्कता ब्यूरो की जांच के बाद नवंबर 2009 में उनके सहित 14 लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज हुई।

विभागीय जांच के साथ जून 2014 में उन्हें निलंबित किया गया। करनाल के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश ने 29 जनवरी 2016 को उन्हें और अन्य आरोपितों को बरी किया। फैसले के खिलाफ अपील 27 नवंबर 2019 को वापस ली गई। दिसंबर 2022 में विभागीय आरोपपत्र वापस हुआ और जनवरी 2023 में रचना गुप्ता बहाल हुईं।

27 गवाहों के बावजूद आरोप साबित नहीं हो सके

सरकार ने दलील दी कि उन्हें संदेह का लाभ देकर बरी किया गया और दोनों मामलों में साक्ष्य के मानक अलग हैं। पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के 27 गवाहों के बावजूद आरोप साबित नहीं हुए। सरकार ने भी विभागीय सजा नहीं दी और कदाचार साबित हुए बिना आरोपपत्र वापस लिया। अदालत के अनुसार, निलंबन के वित्तीय दुष्परिणाम जारी रखने का स्वतंत्र कानूनी आधार नहीं है।