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सवालों के घेरे में हरियाणा फार्मेसी काउंसिल, 72929 फार्मासिस्ट के पदों पर सामने आई चूक

Published: Thu, 24 Sep 2026 04:08 PM (IST)

हरियाणा स्टेट फार्मेसी काउंसिल फर्जी प्रमाणपत्रों, पंजीकरण में देरी और अध्यक्ष पद से जुड़े विवादों के कारण सवालों के घेरे में है।

हरियाणा फार्मेसी काउंसिल पर उठे गंभीर सवाल (प्रतीकात्मक फोटो)

हरियाणा फार्मेसी काउंसिल पर उठे गंभीर सवाल (प्रतीकात्मक फोटो)


HighLights

  1. फर्जी प्रमाणपत्रों से पंजीकरण और अध्यक्ष पद के विवाद कोर्ट तक पहुंचे

  2. पंजीकरण में देरी और सत्यापन की कमी से विश्वसनीयता पर सवाल

  3. 72,929 फार्मासिस्टों के रजिस्टर की निगरानी व्यवस्था कमजोर

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। हरियाणा में 72 हजार 929 पंजीकृत फार्मासिस्टों वाली राज्य फार्मेसी काउंसिल का विवादों से पुराना नाता है।

दवा व्यवस्था के इतने पेशेवरों के पंजीकरण और आचरण पर निगरानी की जिम्मेदारी हरियाणा स्टेट फार्मेसी काउंसिल की है।

25 सितंबर को फार्मासिस्ट डे के मौके पर काउंसिल की भूमिका पर नजर डालें तो सिर्फ उपलब्धियों की तस्वीर सामने नहीं आती।

काउंसिल के कामकाज, पंजीकरण और उसके पदाधिकारियों से जुड़े मामले समय-समय पर अदालतों तक पहुंचे हैं। इससे सबसे बड़ा सवाल काउंसिल की नियामक क्षमता और पंजीकरण व्यवस्था की विश्वसनीयता को लेकर खड़ा हो रहा है।

एक मई, 1971 को हुआ गठन

हरियाणा फार्मेसी काउंसिल का गठन एक मई 1971 को हुआ था। पंजाब स्टेट फार्मेसी काउंसिल के पुनर्गठन के बाद हरियाणा के लिए अलग काउंसिल अस्तित्व में आई थी।

फार्मेसी एक्ट 1948 के तहत राज्य काउंसिल का काम फार्मासिस्टों का रजिस्टर तैयार करना, उसका रखरखाव करना और कानून के मुताबिक पेशेवर गतिविधियों को नियंत्रित करना है।

काउंसिल के पास पेशेवर कदाचार के मामलों में कार्रवाई करने की शक्तियां भी हैं। यानी काउंसिल केवल यह तय करने वाली संस्था नहीं है कि कौन फार्मासिस्ट के रूप में पंजीकृत होगा। उसके फैसले सीधे मरीज की सुरक्षा से जुड़े हैं।

फार्मासिस्ट डॉक्टर की ओर से लिखी दवा उपलब्ध कराने, उसके सही इस्तेमाल, खुराक और सावधानियों की जानकारी देने में अहम भूमिका निभाते हैं।

गलत व्यक्ति का पंजीकरण या पेशेवर नियमों की अनदेखी पूरी व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकता है, जो कि हरियाणा फार्मेसी काउंसिल के साथ बरसों से होता आ रहा है।

अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज कई विवाद

काउंसिल की कार्यप्रणाली से जुड़े विवादों में सबसे गंभीर पहलू शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन रहा है। एक मामले में काउंसिल की जांच के दौरान फार्मेसी डिप्लोमा से जुड़े प्रमाणपत्र पर सवाल सामने आया था।

संबंधित संस्थान से सत्यापन में यह जानकारी मिली कि उस अवधि में वहां फार्मेसी पाठ्यक्रम संचालित नहीं हुआ था।

मामला हाई कोर्ट पहुंचा और अदालत के रिकॉर्ड में प्रमाणपत्र को फर्जी बताया गया। यह मामला यह भी दिखाता है कि पंजीकरण से पहले शैक्षणिक योग्यता की जांच कितनी महत्वपूर्ण है।

पंजीकरण में देरी भी बड़ी समस्या

पंजीकरण में देरी से जुड़े मामलों में अदालत ने काउंसिल की कमजोर स्थिति को भी स्वीकार किया है। एक मामले में प्रमाणपत्रों का सत्यापन मिलने के बाद पंजीकरण कर दिया गया, जबकि एक अन्य आवेदक के दस्तावेजों का संबंधित विश्वविद्यालय से सत्यापन नहीं मिलने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। कई मामलों में काउंसिल की जांच ही संदिग्ध दस्तावेज सामने लाने का जरिया बनी है।

अध्यक्ष पद का विवाद भी पहुंच चुका कोर्ट

अध्यक्ष पद और काउंसिल की संरचना को लेकर भी विवाद अदालत पहुंचा है। 2024 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने तत्कालीन अध्यक्ष के पद पर बने रहने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी।

अदालत के रिकॉर्ड में काउंसिल के 2014 में हुए पुनर्गठन और उसके सदस्यों की संरचना का भी उल्लेख है। काउंसिल ने अब पंजीकरण और नवीनीकरण जैसी सेवाओं को ऑनलाइन किया है।

रजिस्टर जितना बड़ा, जवाबदेही उतनी छोटी

राज्य में पंजीकृत 72,929 फार्मासिस्टों के आंकड़े के सामने असली सवाल संख्या से आगे का है। हर पंजीकरण की शैक्षणिक योग्यता विश्वसनीय तरीके से सत्यापित नहीं है।

पेशेवर कदाचार की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई भी नहीं हो रही। रजिस्टर को लगातार अपडेट करने की व्यवस्था नहीं है।फार्मासिस्ट को सिर्फ पंजीकृत पेशेवर के रूप में समझ लिया गया है।

फार्मासिस्ट डे पर इन्हीं सवालों के बीच हरियाणा फार्मेसी काउंसिल की असली जिम्मेदारी सामने आती है। नामों का रजिस्टर जितना बड़ा है, उसे विश्वसनीय बनाए रखने की जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी है।