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वकील बदलकर सरेंडर करने का वादा तोड़ा, नशा तस्करी के आरोपित को हाईकोर्ट से नहीं मिली अग्रिम जमानत

Published: Fri, 25 Sep 2026 06:35 PM (IST)

हाईकोर्ट ने नशा तस्करी के एक मामले में आरोपित की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट ...और पढ़ें

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला।

HighLights

  1. नशा तस्करी के आरोपित की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका खारिज।

  2. हाईकोर्ट ने वकील बदलने को परिस्थिति में बदलाव नहीं माना।

  3. आरोपित ने आत्मसमर्पण का वादा तोड़कर नई याचिका लगाई।

दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। वकील बदलकर सरेंडर करने का वादा तोड़ना नशा तस्करी के आरोपित को महंगा पड़ा। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने नशा तस्करी के एक मामले में दूसरी अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करने वाले ट्रक मालिक को राहत देने से इन्कार कर दिया।

न्यायमूर्ति आलोक जैन ने कहा कि कोई पक्षकार केवल अपना वकील बदलकर पहले वकील की ओर से अदालत में दिए गए बयान से मुकर नहीं सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वकील बदलना या मामले में नई कानूनी रणनीति अपनाना अपने आप में परिस्थितियों में बदलाव नहीं माना जा सकता। रोहतक निवासी रवि कुमार ने एनडीपीएस अधिनियम के तहत दर्ज मामले में गिरफ्तारी से पहले जमानत की मांग की थी।

अभियोजन के अनुसार, उसके स्वामित्व वाले ट्रक के चालक से 1033 किलो 970 ग्राम डोडा-चूरा पोस्त बरामद हुआ था। आरोपित की पहली अग्रिम जमानत याचिका एक सितंबर 2026 को वापस लेने की अनुमति के साथ खारिज हुई थी।

पहली याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष का जवाब दाखिल हो चुका था और मामले पर विस्तार से बहस भी हुई थी। जब अदालत अग्रिम जमानत देने के पक्ष में नहीं दिखी तो आरोपित के तत्कालीन वकील ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल के निर्देश हैं कि वह अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार है।

हाईकोर्ट ने उसे एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने की अनुमति देते हुए कहा था कि इसके बाद नियमित जमानत याचिका दाखिल करने पर उसका एक सप्ताह में फैसला किया जाए।

हालांकि आरोपित ने आत्मसमर्पण नहीं किया और दूसरे वकील के माध्यम से दोबारा अग्रिम जमानत याचिका दाखिल कर दी। उसने दावा किया कि उसने अपने पहले वकील को आत्मसमर्पण के संबंध में ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था।

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पहली याचिका पर विस्तार से सुनवाई हुई थी

हाईकोर्ट ने कहा कि पहली याचिका शुरुआती स्तर पर वापस नहीं ली गई थी, बल्कि उस पर सरकारी पक्ष की ओर से जवाब दाखिल होने के बाद विस्तार से सुनवाई हुई थी।

आत्मसमर्पण संबंधी बयान भी अदालत के कहने पर नहीं, बल्कि वकील ने अपने मुवक्किल के निर्देशों के आधार पर दिया था। ऐसे में बाद में नया वकील नियुक्त कर उस बयान से मुकरने की अनुमति नहीं दी जा सकती।