दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। ''हरियाणा में शिक्षा विभाग के अधिकारी गूंगे और बहरे हैं। छात्राओं के यौन शोषण जैसे गंभीर मामले की जांच के प्रति भी वे गंभीर नहीं हैं। उन्हें हरियाणा मानवाधिकार आयोग की भी किसी तरह की कोई परवाह नहीं है।'' यह टिप्पणी हरियाणा मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन सेवानिवृत्त जस्टिस एसके मित्तल व जस्टिस दीप भाटिया पर आधारित बेंच ने हरियाणा शिक्षा विभाग के नकारात्मक रवैये को देखते हुए की।

हिसार जिले के आदमपुर के सरकारी स्कूल में शिक्षकों द्वारा एक के बाद एक 40 छात्राओं के साथ यौन शोषण की घटनाएं हुई थीं। इस बाबत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज की गई थी। इस शिकायत के आधार पर हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने मामले में सुनवाई शुरू की थी।

हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने 24 अगस्त 2020 को माध्यमिक शिक्षा विभाग के निदेशक को इस मामले में नोटिस जारी कर 14 दिसंबर तक मामले की स्टेटस रिपोर्ट देने का आदेश दिया, लेकिन निदेशक की तरफ से आयोग के सामने कोई जवाब दायर नहीं किया गया। इसके बाद आयोग ने दोबारा रिमाइंडर जारी कर 16 मार्च 2021 तक रिपेार्ट दायर करने को कहा, लेकिन शिक्षा निदेशक की तरफ से कोई भी रिपोर्ट आयोग के सामने पेश नहीं की गई।

आयोग ने इसके बाद मामले को 13 मई तक स्थगित कर दिया। फिर मामले की सुनवाई टाली गई, लेकिन आयोग की तरफ से कोर्ट में रिपोर्ट दायर नहीं की गई। आयोग के सचिव की तरफ से शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव व निदेशक को संदेश भेज कर रिपोर्ट देने को कहा गया, जिसका कोई फायदा नहीं हुआ। आयोग को लगता है कि निदेशक शिक्षा विभाग इस मामले को दबाना चाहते हैं। जानबूझकर आयोग के आदेश की अवेहलना की जा रही है।

बेंच ने कहा कि मानवाधिकार आयोग शिक्षा विभाग की ऐसी कार्यप्रणाली से खुश नहीं है, जो छात्राओं के यौन शोषण जैसे मामले में नकारात्मक रवैया अपनाकर दोषियों को बचाने का काम कर रहे हैं। शर्म की बात है कि शिक्षा विभाग में ऐसे अधिकारी काम कर रहे हैं।

आयोग ने कहा कि वे ऐसे गंभीर मामले में रिपोर्ट न देने व मामले को दबाए रखने के कारण कठोर आदेश से पहले निदेशक को अंतिम मौका देता है। आयोग ने शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव व निदेशक को 15 दिन के भीतर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। बेंच ने इस आदेश की एक कापी राज्य के मुख्य सचिव को भी भेजने का आदेश देते हुए सुनवाई 17 अगस्त तक स्थगित कर दी।

Edited By: Kamlesh Bhatt