चंडीगढ़, जेएनएन। हरियाणा-दिल्ली बार्डर पर चल रहे किसान संगठन के आंदोलन पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल की आंदोलन खत्‍म करने की अपील का कोई असर नहीं है। मनोहरलाल ने कहा था कि कोरोना महामारी के चलते किसान संगठनों को फिलहाल अपना आंदोलन खत्म कर देना चाहिए। यहां बैठे लोग न तो कोरोना की टेस्टिंग करा रहे हैं और न ही वैक्सीनेशन कराने को तैयार हैं। अभी तक करीब 1800 लोगों ने स्वेच्छा से वैक्सीनेशन कराया है। हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता अभय सिंह चौटाला ने कहा कि मुख्यमंत्री को किसानों से आंदोलन खत्म करने की अपील करने की बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जाकर मिलना चाहिए, ताकि केंद्र सरकार तीन कृषि कानूनों को वापस ले सके।

धरने पर बैठे लोगों के टेस्टिंग नहीं कराने से कोरोना के फैलाव का निरंतर बढ़ रहा खतरा

भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) गुट के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी और प्रवक्ता राकेश बैंस ने भी प्रदेश सरकार को कुछ इसी तरह की सलाह दी है। चढूनी और बैंस ने कहा कि जब किसान इन तीन कृषि कानूनों को चाहते ही नहीं हैं तो फिर केंद्र सरकार इन्हें जबरदस्ती किसानों पर थोपने को लेकर क्यों आमादा है।

चढूनी और बैंस ने कहा कि सरकार कभी किसान संगठनों को जबरदस्ती हटाने का भय दिखाती है तो कभी बातचीत के प्रस्ताव देती है। लेकिन जिन तीन कृषि कानूनों के खिलाफ यह आंदोलन चल रहा है, उन्हें वापस लेने में कोई रुचि नहीं दिखा रही है। सरकार की हठधर्मिता की वजह से ही आंदोलन लंबा चल रहा है।

हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता व इनेलो महासचिव अभय सिंह चौटाला ने कहा कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल के पास अभी भी समय है। उन्हें अपनी कैबिनेट के साथ जल्द से जल्द प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर तीनों कृषि कानून वापस लेने के लिए मनाना चाहिए। तीनों कृषि कानून इस कोरोना महामारी से भी अधिक भयंकर हैं। यह आंदोलन किसानों की फसलों के साथ-साथ उनकी नस्लों का भी भविष्य तय करेगा। इसलिए किसान आरपार की लड़ाई लड़ने से पीछे नहीं हटेंगे। केंद्र सरकार ने कोरोना महामारी की आड़ में ही तीनों कानून बनाए थे, जो किसानों के कतई भी अनुकूल नहींहैं।

अभय सिंह चौटाला ने कहा कि आंंदोलन कर रहे किसानों को भी इस महामारी की चपेट में आने की आंशका से इन्कार नहीं किया जा सकता। भाजपा-जजपा गठबंधन प्रदेश की सरकार चलाने में हर मोर्चे पर बुरी तरह से विफल रहा है।अब तक 350 से अधिक किसान दिवंगत हो चुके हैं, लेकिन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने सहानुभूति का एक शब्द भी उनके बारे में नहीं बोला है। यही मौका है कि केंद्र सरकार को अब अपनी जिद त्यागकर तीनों कृषि कानून वापस लेने चाहियें और किसानों का आंदोलन खत्म कराना चाहिए।

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