जेएनएन, चंडीगढ़। नूंह के गांव सेसौला में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) द्वारा संचालित बाल गृह में भारी अनियमितताएं उजागर हुई हैं। बगैर रिकॉर्ड के यहां रखे गए सभी 38 लड़के-लड़कियां धर्म विशेष के हैं जिन्हें अभिभावकों से मिलने की अनुमति नहीं है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को छापामारी में कई ऐसे संकेत मिले हैं, जिससे इन बच्चों के शोषण की आशंका है। आयोग ने रिपोर्ट सरकार को सौंपते हुए एनजीओ के खिलाफ कड़ा एक्शन लेने की सिफारिश की है।

बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष ज्योति बैंदा ने नूंह में ऑर्फन इन नीड एनजीओ द्वारा संचालित बाल गृृह का दौरा किया। दस्तावेजों की जांच और बच्चों से बातचीत में कई अहम राज फाश हुए, जिससे आयोग की टीम हैरान रह गई। एनजीओ के आधे-अधूरे रिकॉर्ड में इसका कोई जिक्र नहीं कि इन बच्चों को कहां से लाया गया। फाइव स्टार की तर्ज पर बने इस बाल गृह में एक तहखाना मिला है, जिसमें कंट्रोल रूम की तरह कंप्यूटर रखे हुए हैं। एक ऑफिस से इस तहखाने में जाने का रास्ता है, जो ढक्कन से बंद है।

छापामारी मेें जब्त किए गए कागजात भी जेजे एक्ट के प्रावधान के अनुसार नहीं हैं। एनजीओ के पदाधिकारी अपनी आमदनी के बारे में भी बताने से आनाकानी करते रहे। आयोग की चेयरपर्सन ज्योति बैंदा को आशंका है कि संस्था को विदेश से फंडिंग के पूरे आसार हैं।

बाल गृह के संचालकों ने कुछ लोगों से लिखित में शपथपत्र ले रखा था कि वे छह महीने तक बच्चों से मिल नहीं सकते। अगर कोई बच्चा किसी हादसे का शिकार होता है या फिर उसकी मौत हो जाती है तो बाल गृह जिम्मेदार नहीं होगा। बच्चे बाल गृह में कैसे आए, इसकी जानकारी न तो एनजीओ संचालकों के पास है और न कभी सीडब्ल्यूसी (चाइल्ड वेलफेयर कमेटी) और डीसीपीयू (जिला बाल संरक्षण यूनिट) ने पड़ताल की जहमत उठाई।

ज्योति बैंदा के अनुसार सीडब्ल्यूसी और डीसीपीयू ने कभी किसी अभिभावक को तहकीकात के लिए भी नहीं बुलाया। न ही कभी इन बच्चों के सत्यापन की कोशिश की गई। इतनी बड़ी संख्या में एक ही धर्म विशेष के अनाथ बच्चों को एक ही एनजीओ ने अपने बाल गृह में सीधा दाखिला दे दिया, इस पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।

बाल अधिकार संरक्षण आयोग की चेयरपर्सन ज्योति बैंदा ने छापामारी के दौरान एनजीओ पदाधिकारियों से पूछा कि बच्चों को गोद देने की प्रक्रिया में क्यों नहीं लाया गया तो कोई इसका जवाब नहीं दे पाया। बैंदा ने बताया कि बाल गृह में तैनात स्टाफ जेजे एक्ट के मानकों पर खरा नहीं उतरता। स्थानीय स्तर पर संस्था के पास आफिस रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं। इसके उलट प्रबंधन द्वारा बताया गया कि पूरे स्टाफ की नियुक्ति एनजीओ के मुख्यालय द्वारा की जाती है और स्थानीय कार्यालय को इसके बारे में कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया है।

बाल संरक्षण इकाई के अधिकारियों की मिलीभगत की आशंका

आयोग की टीम ने एनजीओ के रजिस्टर की जांच में पाया कि जिला बाल संरक्षण इकाई के अधिकारियों ने इस बाल गृृह का नियमित निरीक्षण किया, लेकिन कभी अनियमिताओं पर गौर नहीं किया। इससे एनजीओ को जिला बाल संरक्षण इकाई के कुछ अफसरों का संरक्षण होने की आशंका है। मामले की गंभीरता को देखते हुए बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने कुछ फाइलों को कब्जे में लेकर विस्तृत रिपोर्ट सरकार को भेज दी है। साथ ही महिला एवं बाल विकास विभाग को तुरंत बाल गृह के संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

ऊबड़-खाबड़ रास्ता, दस-दस बच्चों के विला

वर्ष 2016 से चल रहा बाल गृह ऐसी जगह बनाया गया है, जहां दो-तीन किलोमीटर तक कच्चा रास्ता है। बच्चों को रखने के नियम को पूरी तरह दरकिनार किया गया। यहां पर दस-दस बच्चों के हिसाब से विला बने हुए हैं। नियमों के अनुसार किसी जिले में अनाथ बच्चा मिलता है तो उसे उसी जिले के बाल गृह में रखा जाता है लेकिन यहां कुछ बच्चे इसी धर्म विशेष के पलवल से वहां भेजे गए हैं।

बाल गृह की ओर से अनाथ बच्चों की जानकारी अडॉप्शन पॉर्टल से भी लिंक किया जाता है, लेकिन इस बाल गृह ने ऐसा नहीं किया है। बाल गृह में बच्चों की कभी होम और सोशल स्टडी नहीं की गई ताकि पता चले कि बच्चा कहां से लाया गया। वह कौन है और कैसे अनाथ हुआ। सोशल स्टडी की जिम्मेदारी चाइल्ड वेलफेयर कमेटी और चाइल्ड वेलफेयर ऑफिसर की होती है।

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Posted By: Kamlesh Bhatt