जेएनएन, चंडीगढ़। हरियाणा में इनेलो के साथ राजनीतिक कदमताल कर रही बसपा में सेंधमारी को लेकर कांग्रेस नेता एकमत नहीं हैैं। कांग्रेस और बसपा के राष्ट्रीय स्तर पर मधुर रिश्तों का हरियाणा में लाभ उठाने के लिए जहां पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा प्रयासरत हैं, वहीं कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य रणदीप सिंह सुरजेवाला इस गठजोड़ को जरूरी नहीं मानते। 

हुड्डा चाह रहे बसपा में सेंधमारी, मगर सुरजेवाला बोले-हमें नहीं बसपा की जरूरत

हरियाणा में दस साल तक लगातार राज करने वाली कांग्रेस को विधानसभा में बसपा का साथ मिलता रहा है। हालांकि इनेलो के साथ भी बसपा के राजनीतिक रिश्ते रह चुके हैं। पिछले डेढ़ दशक से सत्ता से दूर चल रही इनेलो ने इसी साल अप्रैल में बसपा के साथ दोबारा गठबंधन की हैैं।

इससे पहले 1998 में इनेलो-बसपा ने मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था। तब अंबाला लोकसभा सीट पर बसपा के अमन नागरा जीते थे। उत्तर प्रदेश का सोशल इंजीनियरिंग फंडा अपनाते हुए हरियाणा में भी चुनाव लडऩे के इनेलो-बसपा के एलान से सबसे अधिक चिंता कांग्रेस को ही है।

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अपनी दूसरी पारी में मुख्यमंत्री बनने के लिए हजकां विधायकों को तोडऩे वाले हुड्डा ने इस बार बसपा में सेंधमारी की रणनीति तैयार की है। इनेलो-बसपा का मेल-मिलाप कराने वाले एक बसपा नेता की हरियाणा से छुïट्टी और कांग्रेस विचारधारा के बसपा नेता की एंट्री से लगता है कि हुड्डा किसी भी समय दांव खेल सकते हैैं। दो दिन पहले चंडीगढ़ आए हुड्डा ने संकेत दिया था कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस व बसपा के बीच गठजोड़ होता है तो हरियाणा में भी इसका फायदा मिलेगा। अब हुड्डा समर्थक विधायक भी यही भाषा बोल रहे हैैं।

इनेलो-बसपा का गठबंधन तोडऩे में कामयाब रहे तो हुड्डा को राजनीतिक फायदा

विधानसभा में अक्सर हुड्डा के लिए संकटमोचक साबित होने वाले रणदीप सिंह सुरजेवाला ने नया ही पैैंतरा फेंका है। अपने पटौदी दौरे के दौरान सुरजेवाला ने स्पष्ट कह दिया कि कांग्रेस को बसपा की बैसाखियों की जरूरत नहीं है। सुरजेवाला ने दलील दी कि कांग्रेस को पहले से दलितों, पिछड़ों और वंचित वर्ग का समर्थन हासिल है। इसलिए उसे बसपा की जरूरत नहीं है।

बसपा ने 1991 में खोला पहला खाता

हरियाणा की राजनीति में बसपा ने 1991 से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। हालांकि बसपा ने 1989 में नूंह से उपचुनाव लड़ा था, लेकिन हार गई थी। 1991 के चुनाव में नारायणगढ़ से बसपा के सुरजीत धीमान पहले विधायक बने। 2000 में जगाधरी से डाॅ. बिशन लाल और 2005 में जगाधरी हलके से ही अर्जुन सिंह गुर्जर बसपा विधायक चुनकर आए। 2009 में जगाधरी से अकरम खान विधायक बने और हुड्डा सरकार में उन्हें डिप्टी स्पीकर बनाया गया। 2014 में पृथला से टेक चंद शर्मा विधायक बने, जिन्होंने भाजपा को समर्थन दे रखा है। बसपा अब उन्हें पार्टी से निकाल चुकी है।

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2014 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का मत फीसद

भाजपा - 33.2 फीसद

इनेलो - 24.1 फीसद

बसपा - 4.4 फीसद

कांग्रेस - 20.6 फीसद (3.6 फीसद हजकां के अलग से)

निर्दलीय - 10.6 फीसद

अकाली दल - 0.6 फीसद

(इस चुनाव में इनेलो ने 88 और बसपा ने 87 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे)


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Posted By: Sunil Kumar Jha