चंडीगढ़, [अनुराग अग्रवाल]। हरियाणा की राजनीतिक राजधानी कहे जाने वाले जींद में पिछले साल हुए उपचुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंक चुकी भाजपा और जजपा बरोदा उपचुनाव का रण जीतने के लिए एक साथ हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के लिए बरोदा की राजनीतिक जमीन ठीक वैसी है, जैसी जींद की थी। जींद उपचुनाव जीतने से पहले भाजपा कभी वहां कमल का फूल नहीं खिला पाई थी। यही स्थिति बरोदा में है। ऐसे में दुष्‍यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी के लिए लोकदल केे समय के वोट बैंक को अपने गठबंधन के साथी की ओर शिफ्ट करने की बड़ी चुनौती है।

बरोदा के रण में आज तक कमल नहीं खिला पाई भाजपा, सहयोगी जजपा पर टिकी आस

दरअसल भाजपा के लिए बरोदा की राजनीतिक जमीन हमेशा से बंजर रही है। इस सीट पर पहले देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व वाले लोकदल का कब्जा रहा तो अब भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने अपना पंजा जमा रखा है। भाजपा के लिए बरोदा में पंजा हटाकर कमल का फूल खिलाने की बड़ी चुनौती है, तो दूसरी ओर, जजपा के सामने लोकदल के वोट बैंक को भाजपा की तरफ शिफ्ट करने की अहम जिम्मेदारी है। जजपा का चुनाव चिन्ह चाबी और भाजपा का कमल का फूल है। भाजपा ने यहां पहलवान योगेश्वर दत्त, कांग्रेस ने नए चेहरे इंदु नरवाल और इनेलो ने जोगिंद्र मलिक को चुनावी रण में उतारा है।

गुटबाजी का शिकार कांग्रेेस को करनी पड़ेगी अपना गढ़ बचाए रखने के लिए खासी मशक्कत

हरियाणा की राजनीति में यह दूसरा मौका है, जब भाजपा व जजपा मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले इन दोनों दलों ने दिल्ली विधानसभा का चुनाव मिलकर लड़ा था, लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। दिल्ली चुनाव के बाद यह माहौल बनने में जरूर मदद मिली कि एक साल पहले दोनों दलों ने जिस लंबे सफर की मंशा से एक दूसरे के हाथों को थामा था, वह आगे भी जारी रहने वाला है।

बरोदा में भाजपा व जजपा दोनों ही एक दूसरे की जरूरत को साबित करते दिखाई देने वाले हैं। इसके लिए बाकायदा कार्य योजना तैयार कर ली गई है। बरोदा उपचुनाव के नतीजे तय करेंगे कि गठबंधन के नेताओं की दोस्ती का अगला स्वरूप कैसा होगा। आने वाले चार सालों में सरकार की चाल-ढाल और रंग-रूप में जनता के माफिक होने वाले बदलाव भी बरोदा की हार-जीत तय करने वाली है।

ओमप्रकाश चौटाला और अभय चौटाला की सक्रियता भी बढ़ा रही बाकी नेताओं की बेचैनी

बरोदा में भाजपा ने अंतरराष्ट्रीय पहलवान योगेश्वर दत्त को दूसरी बार चुनावी रण में उतारा है। पहलवान का टिकट फाइनल होने से पहले चर्चा चली कि जजपा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा. केसी बांगड को चुनाव लड़वा दिया जाए, लेकिन जजपा अध्यक्ष डा. अजय चौटाला और डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने गठबंधन के दायरे को तोड़ने की बजाय इस सीट पर भाजपा की दावेदारी को ही आगे बढ़ाकर रखा।

भाजपा के तमाम नेता बरोदा में सक्रिय हैं, लेकिन उनकी सक्रियता प्रेस कांन्फ्रेंस, एक दूसरे पर राजनीतिक छींटाकशी तथा जीत का दावा करने तक सीमित है। भले ही इसके पीछे कोरोना संक्रमण को कारण बताया जा रहा है। यही वजह है कि अब मुख्यमंत्री मनोहर लाल, प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ और डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला को स्वयं मोर्चा संभालना पड़ा है।

धुआंधार खेलने से बच रहा गठबंधन अब मारेगा शाट

इसमें कोई शक नहीं कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला और अभय सिंह चौटाला काफी पहले से बरोदा में सक्रिय हैं, लेकिन आरंभ की इनिंग (पारी) में धुआंधार खेलने से बच रही भाजपा-जजपा ने अब अपनी रणनीति में बदलाव कर लिया है।

भाजपा के तमाम नेता जहां बैटिंग छोर पर हैं, वहीं उसके सहयोगी दल जजपा के नेता अजय चौटाला, नैना चौटाला, दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला अपनी टीम के साथ भाजपा के लिए क्षेत्ररक्षण की रणनीति तैयार कर मैदान में उतर पड़े हैं। इसके लिए बाकायदा प्रमुख कार्यकर्ताओं की ड्यूटी लगा दी गई है, जिनके सामने लोकदल के वोटों में सेंधमारी की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

भाजपा-जजपा गठबंधन को इसलिए बदलनी पड़ी रणनीति

इसमें कोई शक नहीं कि बरोदा में ओमप्रकाश चौटाला व अभय चौटाला की सक्रियता ने कांग्रेस के साथ-साथ गठबंधन के नेताओं की बेचैनी बढ़ा रखी है। कांग्रेस जहां आपस की गुटबाजी का शिकार है, वहीं यह चुनाव भूपेंद्र हुड्डा और उनके बेटे दीेपेंद्र सिंह हुड्डा की राजनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है।

भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में जितनी चुनौती ओमप्रकाश धनखड़ और उनकी टीम की है, उससे कहीं अधिक जिम्मेदारी मनोहर लाल और उनके सहयोगी दुष्यंत चौटाला की बनी हुई है। इस पूरे चुनाव में ओमप्रकाश चौटाला व अभय सिंह कब किसका गेम बिगाड़ दें, इस पहलू पर भी सबकी निगाह बनी हुई है। यही वजह है कि अब अगले दो चार दिन में गठबंधन बरोदा के रण में नए तेवर में नजर आ सकता है।

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