चंडीगढ़, [अनुराग अग्रवाल]। पूरे देश की तरह हरियाणा के लोग भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के देहावसान की खबर से शोक में हैं। राजनीति के शुरुआती दौर से ही वाजपेयी का हरियाणा से करीबी रिश्ता रहा। लोगों के दिलों में बसे वाजपेयी ने सरकार और संगठन में शीर्ष पर रहते हुए न केवल भावनात्मक रूप से हमेशा हरियाणा को प्राथमिकता में रखा, बल्कि प्रदेश में गठबंधन की राजनीति को जन्म देते हुए हरियाणा में अकेले पार्टी के दम पर कमल खिलाने में भी कामयाब रहे।

कारगर रहे हविपा और इनेलो के साथ गठबंधन के अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक प्रयोग

पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल के साथ मधुर संबंधों की नींव पर वाजपेयी ने प्रदेश में गठबंधन की राजनीति का आधार तैयार किया। वर्ष 1977 में आपातकाल से लेकर पिछले लोकसभा चुनाव तक वाजपेयी जब भी हरियाणा आए, राजनीतिक लिहाज से उनका आगमन अहम साबित हुआ। आपातकाल के दौरान भिवानी में वाजपेयी ने जनसंघ की बैठक को संबोधित किया था, जिसके बाद पूरे देश में तत्कालीन सरकार का सूपड़ा साफ हो गया।

आपातकाल से लेकर पिछले लोकसभा चुनाव तक वाजपेयी जब भी हरियाणा आए, सियासत ने बदली करवट

वाजपेयी ने वर्ष 1980-81 में भिवानी में एक बड़ी रैली को संबोधित किया था। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह और पूर्व उपप्रधानमंत्री चौ. देवीलाल जैसे दिग्गज साथ थे। इसी तरह वर्ष 1987 में भी वाजपेयी ने हरियाणा में दस्तक देकर जबरदस्त सत्ता परिवर्तन की बुनियाद रखी। तब लोकदल ने सहयोगी दल के साथ 78 सीटों पर कब्जा जमाते हुए सरकार बनाई थी। चौ. देवीलाल, चौ. बंसीलाल और चौ. ओमप्रकाश चौटाला के साथ उनके मधुर रिश्ते थे।

चौधरी देवीलाल व मुलायम सिंह यादव के साथ अटल बिहारी वाजपेयी।  (फाइल फोटो)

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गठबंधन की राजनीति का नया प्रयोग

हरियाणा में भाजपा का आधार मजबूत करने में वाजपेयी की दूरदर्शी सोच कारगर रही। वर्ष 1996 में वाजपेयी ने प्रदेश भाजपा को हरियाणा विकास पार्टी के साथ हाथ मिलाने की हरी झंडी दी। इसके बाद गठबंधन की राजनीति के सफल दौर की शुरुआत हुई। गठबंधन के बाद वाजपेयी ने ताबड़तोड़ चुनावी जनसभाएं की जिसके चलते प्रदेश में गठबंधन की सरकार बनी। हालांकि तीन साल बाद शराबबंदी को लेकर मतभेदों के चलते भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई।

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देवीलाल से नजदीकियों ने दिलाया नया प्लेटफार्म

पूर्व उपप्रधानमंत्री और हरियाणा की सियासत के पुरोधा स्व. देवीलाल से वाजपेयी के हमेशा बढिय़ा संबंध रहे। हविपा से अलग होने की भरपाई करते हुए वाजपेयी ने 1999 में इनेलो से गठबंधन का दांव खेला और प्रदेश में सरकार बनाई। दोनों दलों ने पूरे पांच साल सरकार चलाई, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री की विशेष ताकीद थी कि संगठन की मजबूती पर काम किया जाए। इसी का नतीजा है कि शहरों की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा गांवों में पहुंची और वर्ष 2014 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही। हालांकि यह मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वाजपेयी जी की नीतियों का अनुसरण करने से भी संभव हुआ है।

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वाजपेयी के नेतृत्व में फले-फूले मोदी और मनोहर

संगठन में जब पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की तूती बोलती थी, तब उन्होंने पार्टी के हरियाणा प्रभारी नरेंद्र मोदी और संगठन का जिम्मा संभाले मनोहर लाल को खूब प्रमोट किया। मनोहर लाल फिलहाल हरियाणा में भाजपा के मुख्यमंत्री हैैं। वर्ष 1994-95 में वाजपेयी की पहल पर ही मनोहर लाल को संघ की तरफ से सक्रिय राजनीति में उतारा गया था। इसके बाद 1997-98 में नरेंद्र मोदी को हरियाणा का प्रभारी बनाया गया। भाजपा की विचारधारा से लोगों को कैसे जोड़ा जाए और सीधे संवाद की परंपरा कैसे बढ़े, इस पर वाजपेयी के टिप्स को आत्मसात कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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हरियाणा के भाजपा नेताओं से था नजदीक का नाता

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हरियाणा के प्रमुख पार्टी नेताओं को नाम से व्यक्तिगत तौर पर जानते थे। मुख्यमंत्री मनोहर लाल से उनका बेहद लगाव था। मनोहर लाल भी उन्हें राजनीति में बेहद सम्मान देते थे। मनोहर लाल के अलावा प्रो. रामबिलास शर्मा, प्रो. गणेशी लाल, रतन लाल कटारिया, किशन सिंह सांगवान, सुधा यादव और ओमप्रकाश धनखड़ को अटल बिहारी नाम से जानते थे। मोदी कैबिनेट में सीनियर मंत्री सुषमा स्वराज से उनका खास लगाव था।

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Posted By: Sunil Kumar Jha