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सड़क पर संघर्ष के बीच हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी, 6 में से 5 सांसदों के दम पर हुड्डा गुट भारी; विरोधियों ने खोला मोर्चा

Published: Tue, 06 Oct 2026 05:20 PM (IST)

हरियाणा कांग्रेस में लंबे समय बाद सियासी सक्रियता दिख रही है, जहां पार्टी के नेता सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं।

हरियाणा कांग्रेस में सड़क पर संघर्ष, भीतर सियासी शह-मात।

हरियाणा कांग्रेस में सड़क पर संघर्ष, भीतर सियासी शह-मात।

HighLights

  1. हरियाणा कांग्रेस में लंबे समय बाद राजनीतिक सक्रियता और विरोध प्रदर्शन

  2. सामूहिक संघर्ष के बावजूद, पार्टी के भीतर गुटबाजी और व्यक्तिगत हित हावी

  3. संजय दत्त नेताओं को एकजुट कर सामूहिक नेतृत्व की ओर बढ़ा रहे

अनुराग अग्रवाल, चंडीगढ़। हरियाणा कांग्रेस में लंबे समय बाद सियासी सक्रियता दिखाई दे रही है। कांग्रेस प्रभारी संजय दत्त और प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह की पहल पर पार्टी के तमाम क्षत्रप सड़कों पर उतर आए हैं।

ब्लॉक स्तरीय सम्मेलनों और विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं नई ऊर्जा में दिखाई देने लगे हैं। पिछले 12 साल से सत्ता से दूर चल रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तक सड़क पर सार्वजनिक संघर्ष करते नजर आ रहे हैं।

कांग्रेस में सामूहिक संघर्ष का दौर

कांग्रेस नेताओं की इस एकजुटता की तस्वीर के पीछे उनकी पुरानी गुटबाजी भी उतनी ही स्पष्ट है। पार्टी का सामूहिक संघर्ष चल रहा है, मगर उसके भीतर हर नेता अपने राजनीतिक हित, प्रभाव क्षेत्र और भविष्य की संभावनाओं को भी साध रहा है। यही हरियाणा कांग्रेस की मौजूदा राजनीति का सबसे दिलचस्प व विचारणीय पहलू है।

कुमारी सैलजा लगातार संगठन और नेतृत्व से जुड़े सवालों को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा खेमे पर निशाना साध रही हैं। दूसरी ओर, हुड्डा की राजनीति का केंद्रीय फोकस अपने प्रभाव और बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा की लोगों में स्वीकार्यता को मजबूत करने पर है।

6 में से 5 सांसद हुड्डा गुट से

दीपेंद्र के समर्थकों द्वारा उन्हें भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जा रहा है तो उनकी इस रणनीति का पार्टी में विरोध भी चालू हो गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्य में हुड्डा गुट बेहद पावरफुल है और अधिकतर विधायक उन्हीं के खेमे के हैं। छह में से पांच सांसद भी हुड्डा गुट के हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर नेतृत्व की बहस समानांतर रूप से चल पड़ी है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह और उनके बेटे बृजेंद्र सिंह भी हुड्डा खेमे को लेकर लगातार मुखर हो रहे हैं। हिसार लोकसभा चुनाव में बृजेंद्र की हार के बाद उनके राजनीतिक तेवरों में हुड्डा विरोध का स्वर कई बार उभर चुका है।

बृजेंद्र कांग्रेस की चुनावी पराजय के कारणों पर सवाल उठाते हुए संगठन और नेतृत्व की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। दोनों पिता पुत्रों के निशाने पर हुड्डा खेमा बना हुआ है।

सुरजेवाला की राजनीति सबसे अलग

इसी बीच रणदीप सिंह सुरजेवाला की राजनीति सबसे अलग दिखाई दे रही है। उनकी भाषा अपेक्षाकृत संयमित और रणनीतिक है। वह किसी एक खेमे के साथ पूरी तरह खड़े दिखाई देने की बजाय सारे खेमों के लिए राजनीतिक गुंजाइश बनाए रखे हुए हैं।

संजय दत्त की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका प्रयास नेताओं को व्यक्तिगत खेमेबाजी से निकालकर पार्टी के मुद्दों पर सक्रिय करने का है। अभी तक हरियाणा में अधिकतर प्रभारी संगठनात्मक बैठकों और बंद कमरों तक सीमित दिखाई देते थे, मगर संजय दत्त ने सभी खेमों को कांग्रेस व लोगों के लिए सड़क पर लड़ाई लड़ने को तैयार कर दिया है।

असली परीक्षा सामूहिक नेतृत्व स्वीकार करने की

दरअसल, कांग्रेस के लिए चुनौती केवल भाजपा के खिलाफ सड़क पर उतरने की नहीं है, बल्कि इस संघर्ष को एक साझा राजनीतिक अभियान में बदलने की भी है। प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह भी सभी गुटों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं।

फिलहाल इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि कांग्रेस कार्यकर्ता सक्रिय दिख रहा है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी, जब सड़क का यह संघर्ष चुनावी रणनीति और साझा नेतृत्व में बदलेगा। यदि हर क्षत्रप कांग्रेस के मंच का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में ही करता रहा, तो आज की भीड़ कल की एकजुटता की गारंटी नहीं होगी।