जेएनएन, चंडीगढ़। हाई कोर्ट के फैसले से प्रभावित 4654 कर्मचारियों की नौकरियां बचाने के साथ ही करीब 50 हजार कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने के लिए सरकार ने खाका खींच दिया है। सरकार की ओर से विधानसभा के मानसून सत्र में लाए जाने वाले बिल के ड्राफ्ट की कॉपी कर्मचारी संगठनों को सौंप दी गई है।

सरकार ने विधानसभा में लाए जा रहे बिल का ड्राफ्ट कर्मचारी संगठनों को सौंपा, मांगे सुझाव

इस पर सर्व कर्मचारी संघ सहित विभिन्न कर्मचारी संगठनों से सुझाव मांगे गए हैं, इसके बाद नियम और शर्तें तय होंगी। सर्व कर्मचारी संघ ने 17 अगस्त को शुरू हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र के पहले ही दिन विधेयक लाने के लिए सरकार पर दबाव बनाया हुआ है। गत 21 जुलाई को मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव राजेश खुल्लर और अगले दिन उप प्रधान सचिव मंदीप सिंह बराड़ ने कर्मचारी नेताओं को एक सप्ताह में विधेयक का ड्राफ्ट सौंपने का भरोसा दिलाया था। सोमवार को ड्राफ्ट की कॉपी सर्व कर्मचारी संघ को सौंप दी गई। विधेयक का नाम हरियाणा सरकार रेगुलराइजेशन ऑफ सर्विस बिल-2018 रखा गया है।

सर्व कर्मचारी संघ के प्रधान धर्मबीर फौगाट व महासचिव सुभाष लांबा ने बताया कि सहायक अटॉर्नी जरनल प्रविंद्र चौहान के कार्यालय से मेल के जरिये ड्राफ्ट मिल गया है। उन्होंने कहा कि सर्व कर्मचारी संघ बिल के ड्राफ्ट का गहनता से अध्ययन करने के बाद ही सरकार को अपने सुझाव देगा। ड्राफ्ट पर अभी कोई प्रतिक्रिया देना जल्दबाजी होगी। हालांकि उन्होंने कहा कि जब तक बिल हमारे सुझावों के अनुरूप विधानसभा में पारित नहीं होता, आंदोलन जारी रहेगा। इसके तहत 9 अगस्त को सभी जिलों में मशाल जुलूस निकाल कर प्रदर्शन किए जाएंगे।

कल से संसद पर दो दिवसीय धरना

भले ही सरकार ने बिल का ड्राफ्ट सर्व कर्मचारी संघ को सौंप दिया है, लेकिन सर्व कर्मचारी संघ कोई ढिलाई बरतने को तैयार नहीं है। संघ की अगुआई में हाई कोर्ट के फैसले से प्रभावित कर्मचारी बुधवार से संसद के सामने दो दिन के लिए सामूहिक धरना देंगे। इस दौरान लोकसभा व राज्यसभा के सभी सदस्यों को ज्ञापन सौंपकर समर्थन जुटाया जाएगा।

बिल पर विपक्षी दलों से मांगा सहयोग

सर्व कर्मचारी संघ की उप प्रधान सविता, प्रवक्ता इंद्र सिंह बधाना व ऑडिटर सतीश सेठी ने बिल पर समर्थन के लिए सभी दलों के विधायकों से गुजारिश की गई है। उन्होंने बताया कि कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों के अध्यक्षों को ज्ञापन देकर स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम उमा देवी के केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 अप्रैल, 2016 को दिए फैसले को संसद द्वारा निष्प्रभावी बनाने की मांग भी की जाएगी।

Posted By: Sunil Kumar Jha