'नाना से बेहतर इंसान नहीं देखा', राष्ट्रपति अवॉर्डी पूर्व सरपंच बोले- अभिनेता संग मिल 2 गांवों की बदली थी तकदीर
पूर्व सरपंच राधेश्याम गोमला और अभिनेता नाना पाटेकर ने 'नाम फाउंडेशन' के साथ मिलकर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में जल संरक्षण का ऐतिहासिक अभियान चलाया।
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पूर्व सरपंच और मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर। जागरण
HighLights
पूर्व सरपंच राधेश्याम गोमला को जल संरक्षण में राष्ट्रपति अवार्ड मिला।
नाना पाटेकर के 'नाम फाउंडेशन' संग महाराष्ट्र में जल संरक्षण अभियान।
सूखी नदियों का पुनरुद्धार कर धोंधल गांव की तकदीर बदली।
बलवान शर्मा, नारनौल। महेंद्रगढ़ जिले के छोटे से गांव गोमला के पूर्व सरपंच राधेश्याम गोमला की पहचान केवल एक जन प्रतिनिधि की नहीं, बल्कि एक सच्चे जल-योद्धा की है।
गांव के सरपंच रहते हुए जल संरक्षण के क्षेत्र में किए गए ऐतिहासिक कार्यों के लिए उन्हें 'राष्ट्रपति अवार्ड' से नवाजा जा चुका है। लेकिन उनकी समाजसेवा का दायरा केवल अपने गांव या राज्य तक सीमित नहीं रहा; उन्होंने महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में भी पानी की हर बूंद को सहेजने के लिए जी-जान लगा दी।
जून 2015 से 2017 तक राधेश्याम गोमला ने मशहूर अभिनेता और समाजसेवी नाना पाटेकर की संस्था 'नाम (NAAM) फाउंडेशन' के साथ मिलकर जल संरक्षण का एक ऐतिहासिक अभियान चलाया। दोनों ने मिलकर औरंगाबाद और आसपास के भीषण सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पुरानी, सूख चुकी नदियों का खोदीकरण और पुनरुद्धार करवाया, जिससे मृतप्राय हो चुकी नदियों में एक बार फिर जीवन लौट आया।

दो गांवों की बदली तकदीर, बना मिसाल
इस अभियान के तहत नाना पाटेकर और राधेश्याम गोमला ने महाराष्ट्र के दो गांवों-धोंधल और गोगल को गोद लिया। राधेश्याम गोमला के जुनून और कार्यकुशलता का ही नतीजा था कि धोंधल गांव की तस्वीर महज दो महीने के भीतर पूरी तरह बदल गई।
'नाम फाउंडेशन' के सहयोग और बेहतर प्रबंधन की बदौलत केवल सवा चार लाख रुपये की लागत में 1,200 की आबादी वाले इस पूरे गांव का कायाकल्प कर दिया गया।
वहीं, गांव में जल संरक्षण का यह मॉडल इतना अद्भुत और अनुकरणीय बन गया कि इसे देखने और समझने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर न्यायपालिका के जज तक धोंधल गांव पहुंचे।
"नाना पाटेकर से बेहतर इंसान नहीं देखा"
नाना पाटेकर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के अपने अनुभवों को याद करते हुए राधेश्याम गोमला कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में नाना पाटेकर जैसा सादगीपसंद और समर्पित इंसान नहीं देखा। उनमें रत्ती भर भी अभिमान नहीं था और वे पूरी ऊर्जा व निष्ठा के साथ दिन-रात लोगों की सेवा में समर्पित रहते थे।
राधेश्याम गोमला और नाना पाटेकर की यह जुगलबंदी इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अगर इंसान के भीतर निस्वार्थ भावना, अटूट जुनून और सही दिशा हो, तो सीमित संसाधनों में भी सूखी नदियों को जीवित किया जा सकता है और हजारों जिंदगियों को खुशहाल बनाया जा सकता है।
