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महेंद्रगढ़ के बाघेश्वर धाम बाघोत की अनोखी कथा, जहां भगवान शिव ने बाघ बनकर ली थी राजा दिलीप की परीक्षा

Published: Tue, 11 Aug 2026 11:40 AM (IST)

बाघोत के पौराणिक बाघेश्वर धाम में सावन शिवरात्रि पर विशाल मेला लगा, जहां हरिद्वार से गंगाजल लेकर हजारों कांवड़िये जलाभिषेक ...और पढ़ें

बाघेश्वर धाम में स्थापित प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग। जागरण

बाघेश्वर धाम में स्थापित प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग। जागरण 

HighLights

  1. सावन शिवरात्रि पर बाघेश्वर धाम, बाघोत में विशाल मेला।

  2. हजारों कांवड़िये हरिद्वार से गंगाजल लेकर करेंगे जलाभिषेक।

  3. संतान प्राप्ति हेतु वटवृक्ष पर धागा बांधने की पुरानी मान्यता।

संवाद सहयोगी, (कनीना) नारनौल। जहां कभी भगवान शिव ने बाघ का रूप धारण कर राजा दिलीप की परीक्षा ली थी, आज उसी पौराणिक धरती बाघोत में आस्था का सैलाब उमड़ेगा। सावन की शिवरात्रि पर मंगलवार को बाघेश्वर धाम में विशाल मेला लगेगा। हरिद्वार और ऋषिकेश से गंगाजल लेकर लौट रहे हजारों कांवड़िये यहां स्वयंभू शिवलिंग पर जलाभिषेक करेंगे।

मेले को लेकर मंदिर परिसर को सजाया गया है और श्रद्धालुओं की कतार के लिए रेलिंग, पेयजल, ठहरने तथा सुरक्षा के प्रबंध किए गए हैं। बाघोत का धार्मिक इतिहास लोककथाओं और पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है। मान्यता है कि बाघोत का प्राचीन नाम हरयेक वन था और यहां पीपलाद ऋषि का आश्रम था।

राजा दिलीप संतान प्राप्ति के लिए अपने कुलगुरु वशिष्ठ के पास पहुंचे थे। वशिष्ठ ने उन्हें पीपलाद ऋषि के आश्रम में नंदिनी गाय और कपिला बछिया की सेवा करने का आदेश दिया। एक दिन भगवान शिव ने राजा की परीक्षा लेने के लिए बाघ का रूप धारण किया और बछिया पर झपटा।

बछिया को बचाने के लिए राजा दिलीप ने अपने प्राण तक न्योछावर करने की तैयारी कर ली। तभी बाघ के स्थान पर स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए और राजा को आशीर्वाद दिया। इसी मान्यता के कारण इस स्थान का नाम बाघोत पड़ा और यहां स्थापित शिवालय बाघेश्वर धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

संतान की कामना लेकर दूर-दूर से पहुंचते हैं दंपती

बाघेश्वर धाम केवल कांवड़ चढ़ाने के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है। यहां संतान की कामना लेकर भी दूर-दराज से दंपती पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में स्थित पुराने वटवृक्ष पर श्रद्धालु कच्चा धागा बांधकर संतान प्राप्ति की मन्नत मांगते हैं। मान्यता है कि मनोकामना पूर्ण होने के बाद श्रद्धालु दोबारा धाम पहुंचकर धागा खोलते हैं। यही कारण है कि वटवृक्ष का तना आज भी सैकड़ों-हजारों धागों से लिपटा दिखाई देता है।

स्वयंभू शिवलिंग पर चढ़ेगा गंगाजल

बाघोत का शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है। सावन शिवरात्रि पर हरिद्वार और ऋषिकेश से गंगाजल लेकर लौट रहे कांवड़िये यहां जल अर्पित करते हैं। खड़ी, बैकुंठी, टोकना, झूला, थैला और डाक कांवड़ लेकर शिवभक्त लगातार धाम की ओर बढ़ रहे हैं। रास्तों में हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारों से वातावरण शिवमय बना हुआ है। शिवरात्रि मेले को लेकर बाघेश्वर धाम को आकर्षक रोशनी से सजाया गया है।

श्रद्धालुओं को व्यवस्थित तरीके से दर्शन कराने के लिए रेलिंग लगाई गई हैं। मंदिर के सामने स्थित जोहड़ के आसपास भी श्रद्धालुओं की आवाजाही को नियंत्रित करने की व्यवस्था की गई है। भंडारों और धर्मशालाओं में कांवड़ियों के ठहरने तथा भोजन की व्यवस्था की गई है।

बाघोत में वर्ष में दो बार प्रमुख धार्मिक आयोजन होते हैं। सावन की शिवरात्रि पर कांवड़ियों की संख्या सबसे अधिक रहती है, जबकि सर्दियों में आने वाली महाशिवरात्रि पर भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। छोटे से गांव में स्थित यह प्राचीन धाम वर्षभर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना रहता है।