संवाद सहयोगी, इंद्री

राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में सृजन मंच के तत्वावधान में देस हरियाणा काव्य-गोष्ठी हुई। इसमें कई कवियों ने अपनी कविताओं के जरिये सरकारी विभागों विशेष तौर पर हरियाणा रोडवेज के निजीकरण के खिलाफ आवाज बुलंद की। उन्होंने देश की सांझी संस्कृति को नुकसान पहुंचाने और साम्प्रदायिक और जातिवाद पर आधारित राजनीति पर भी जमकर तंज कसे। कवियों ने सामूहिक रूप से एक पत्रिका के ताजे अंक का विमोचन किया।

काव्य-गोष्ठी की अध्यक्षता नरेश कुमार मीत ने की और संचालन अरुण कैहरबा ने किया। प्रगतिशील दयाल चंद जास्ट ने काव्य-गोष्ठी में तरन्नुम में अपनी रागिनी के जरिये श्रोताओं की संवेदनाओं को झकझोर दिया। उन्होंने ब्यां किया कि रोडवेज पै संकट आग्या बहुत घणा दुख पाया मैं, निजीकरण की चली कटारी खड्या रोम-रोम काया मैं। वे आगे अंतरे में कहते हैं नीले रंग की हारी लारी, जिसकी कोई रीस नहीं, इसके तोड़ की कोई गाडी मिलती बीसवें बीस नहीं, बेड़ा गरक कर री सरकार जाती या दिल से टीस नहीं। नरेश मीत ने अपनी दशा-दुर्दशा शीर्षक कविता में कुछ यूं कहा-प्रजाहित की छोड़ नीतियां, निजहित अब सधने लगे हैं, जिस जनता के कंधे पर चढ़कर पहुंचे सत्ता के गलियारों में, छीन रहे रोटी का निवाला भी उनका रौंद पैरों तले उनको चलने लगे हैं।

Posted By: Jagran