जागरण संवाददाता करनाल : पुलिस कितना दुस्साहस करती है। संदीप की मौत इसका उदाहरण है। पहले तो यह जाने बिना कि उसे तैरना आता है या नहीं, उसे जबरदस्त गहरे पानी में उतरने को मजबूर किया। जब उसकी डूबने से मौत हो गई तो वारदात को दबाने की कोशिश करती रही। यह कोशिश एक दो घंटा नहीं सुबह नौ बजे लेकर शाम नौ बजे तक होती रही। परिजन यदि करनाल में एसपी सुरेंद्र सिंह भौरिया के निवास पर न पहुंचते तो वारदात को दबा ही दिया था। पीड़ित परिवार ने बताया कि घरौंडा और मधुबन पुलिस में तो उनकी बात तक नहीं सुनी। उन्हें वहां से भगा दिया गया। ऐसे में उनके सामने एसपी के सामने पेश होने के सिवाय कोई चारा ही नहीं बचा था। एसपी निवास पर मृतक के पिता रामपाल ने बताया कि उसके बेटे की हत्या पुलिस ने की है।

कुटिलता : हत्या को हादसा बनाने की कोशिश

पीड़ितों ने बताया कि पुलिस ने इंसानियत की सारी हदें पार कर दी। हर कदम पर हत्या को हादसा दिखाने की कोशिश होती रही। मृतक संदीप के पिता रामपाल ने बताया कि उसके बेटे की हत्या की गई है। उसे पानी में उतरने के लिए मजबूर किया गया है। वह तो नहर किनारे टहल रहा था। पुलिसकर्मियों ने वर्दी का रूआब दिखा कर उसे पानी में उतरा। जब संदीप ने विरोध करना चाहा तो उसे डराया गया। इसी डर के मारे वह कांपता हुआ पानी में उतर गया। यह हादसा नहीं सुनियोजित हत्या है।

असंवेदनशीलता: पहले गलती फिर लीपापोती की कोशिश

पानी में बह रहे शव को संदीप से निकलवाना ही अपने आप में पुलिस की बड़ी गलती है। पुलिस इस तरह से किसी को नहर में उतरने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। जब वह डूब गया तो उसे बचाने की कोई कोशिश नहीं की। जब उसकी मौत हो गई तो शव को बाहर निकाला। उसे मधुबन के अर्पणा अस्पताल में ले गए। जहां डॉक्टरों ने मामला कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज में रेफर कर दिया। तब भी आरोपित पुलिसकर्मी खुद को बचाने की कोशिश में जुटे रहे। शव अस्पताल में रखकर फरार हो गए। उन्होंने परिजनों को वारदात की जानकारी देना भी उचित नहीं समझा।

गैरजिम्मेदाराना रवैया: अधिकारियों ने भी आरोपित पुलिसकर्मियों को बचाने की कोशिश की

परिजनों को जब वारदात का पता चला तो वह सबसे पहले मधुबन पुलिस स्टेशन में पहुंचे। उन्हें बताया गया कि संदीप की डूबने से मौत हुई। परिजनों ने जब शिकायत दर्ज करानी चाही तो उन्हें थाने से भगा दिया। इस पर जब वह घरौंडा पहुंचे तो वहां भी उनकी सुनवाई नहीं हुई। पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों की हर संभव यही कोशिश थी कि मामले को दबा दिया जाए। वह आरोपितों को बचाने के लिए एकजुट हो रहे थे। उनकी शिकायत तक नहीं ली जा रही थी।

सवा नौ बजे घरौंडा डीएसपी बोले-मामला दर्ज करने के लिए पीड़ितों का इंतजार कर रहे हैं

सरकार तो यहां तक दावा करती है कि वारदात यदि दूसरी जगह हो और पीड़ित दूसरे पुलिस स्टेशन में शिकायत दे तो जीरो एफआइआर दर्ज करनी चाहिए। सरकार की इस नीति का घरौंडा पुलिस कितना पालन कर रही है, इसका पता संदीप की मौत के बाद पुलिस के रवैये से लग रहा है। मधुबन थाने में जब पीड़ित पुलिसकर्मियों की शिकायत लेकर गए तो वहां उनकी बात सुनी ही नहीं गई। उन्हें वहां से चलता कर दिया गया। शाम सवा नौ बजे जब डीएसपी घरौंडा रामदत्त ने बताया कि वारदात को लेकर अभी मामला दर्ज नहीं किया गया। परिजन अभी तक उनके पास नहीं आए। एक बार आ जाए तो आगे की कार्रवाई होगी।

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