जागरण संवाददाता, करनाल

हरियाणा रोडवेज करनाल डिपो के बेड़े की हालत चिंताजनक है। बसों की घटती संख्या के कारण दिन के समय में बसें ओवरलोड चल रहीं हैं। जबकि रात्रि आठ बजे के बाद यात्री बे-बस हो जाते हैं।

हालात ये हैं कि पिछले डेढ़ साल में एक भी रोडवेज की नई बस शामिल नहीं की गई। जबकि इस दौरान 16 बसें रिटायर हो गई। इसका असर भी देखने को मिला। रोडवेज की बसें कम होने से गांवों में बसों की सर्विस कम हो गई, स्टूडेंट्स और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों ने बसों की इस समस्या को लेकर कई बार आलाधिकारियों और सीएम के समक्ष रखी थी। इस मुद्दे का हल निकालने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन हुआ नहीं। इस समय करनाल में कुल 172 बसें ही बेड़े में हैं, जिसमें से भी 7 से 8 बसें वर्कशाप के अंदर खड़ी रहती हैं। इनमें से भी कुछ बसें कंडम हो चुकी हैं, जो रिटायर की जानी हैं। रात को टेंपो और जीप की जोखिम भरी सवारी

रात के समय गांवों में तो सर्विस देने की तो दूर की बात है, कस्बों में भी आठ बजे के बाद कोई सर्विस नहीं है। ऐसी स्थिति में रात के समय यात्री टेंपों या जीप में लटककर घर तक पहुंचते हैं। जिनकी जान अक्सर जोखिम में रहती है। पहले हादसे भी हुए हैं, पर जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। हालात जस के तस बने हुए हैं, रोडवेज की स्थिति सुधारने के लिए कोई काम नहीं हुए। एक सब डिपो बना, उसमें भी बसें कम

हाल ही में असंध को सब डिपो बनाया गया। सीएम ने इसका उद्घाटन किया था। नए सब डिपो में 40 बसों की जरूरत थी, लेकिन यह सब डिपो चलाने के लिए उधार की बसों से काम चल रहा है। इस समय महज 14 बसें ही सब डिपो में चल रही हैं। जोखिम लेकर दौड़ रही कंडम बसें

करनाल डिपो के बेड़े में कई ऐसी बसें हैं जो कंडम हालत में भी सड़कों पर दौड़ रही हैं। बेड़े में बसों की कमी होने के कारण कंडम बसों को काम चलाऊ तौर पर ठीक कराकर दौड़ाया जा रहा है। परिवहन विभाग की यह दिक्कत किसी से छिपी नहीं है। बसें ठीक नहीं होने के कारण कई बार बीच सड़क ही बसें रुक जाती हैं, जिससे यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। दूसरी बस आने तक लोगों वहीं पर खड़े होकर इंतजार करना पड़ता है। बीच रास्ते में जवाब दे जाती हैं बसें

परिवहन विभाग की कर्मशाला में बसों को ठीक करवाने के लिए काफी गहमा-गहमी करनी पड़ती है। स्टाफ का टोटा होने के कारण बसों का भी काम चलाऊ तरीके से किया जा रहा है। इस कारण हर तीसरे दिन बसें बीच सड़क ही खराब हुई खड़ी रहती है। बसों की अच्छी मरम्मत कराने के लिए बस चालक को अपनी जेब से पैसे खर्चने पड़ते हैं। निजी बस चालकों की मनमर्जी से परेशानी

जिले में निजी बसें भी अधिकतर रूटों पर दौड़ रही हैं। हालांकि प्रदेश सरकार भी पिछले साल 2519 बसों को नए रूटों पर दौड़ाना चाहती थी, लेकिन परिवहन विभाग के कर्मचारियों की ओर से भी लगातार किए जा रहे धरने प्रदर्शन और विरोध को देखते हुए इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। रोडवेज कर्मचारियों का आरोप है कि विभाग का निजीकरण किया जा रहा है। वर्जन

जीएम रोडवेज रविद्र पाठक के मुताबिक बेड़े में 240 बसें स्वीकृत हैं, लेकिन लंबे समय से नई बसें शामिल नहीं होने के कारण बसों की संख्या कम हुई है और बसों पर दबाव बढ़ता चला गया। पिछले साल 16 बसें रिटायर की गई थीं। सरकार को नई बसों के लिए डिमांड भेजी गई है। चुनाव के बाद उम्मीद है कि नई बसें रोडवेज के बेड़े में शामिल होंगी। फिलहाल जितनी बसें हैं उनसे काम चलाया जा रहा है।

Posted By: Jagran

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