नेताजी की जयंती पर साहित्यकार डा. मुकेश अग्रवाल ने साझा किए विचार जागरण संवाददाता, करनाल: भारत की आजादी के आंदोलन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। अत्यंत निडरता से नेताजी ने जिस प्रकार अंग्रेजों का मुकाबला किया, उसका अन्य उदाहरण नहीं मिलता है। वह युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। नेताजी की 125वीं जयंती पर ये विचार वरिष्ठ चिकित्सक एवं लेखक डा. मुकेश अग्रवाल ने साझा किए। अपने वक्तव्य में उन्होंने बताया कि नेताजी मानते थे कि आजादी मांगी नहीं, छीनी जाती है। 1921 में नेताजी प्रशासनिक सेवा छोड़ आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। लाखों युवाओं का उन्हें समर्थन मिला। उनमें असीम साहस और अनूठी संकल्प शक्ति थी और जीवन पर स्वामी विवेकानंद का बहुत प्रभाव था। 20 जुलाई 1921 को उनकी महात्मा गांधी से भेंट हुई। भगत सिंह की फांसी की सजा न रुकवा पाने के कारण सुभाष गांधीजी से नाराज थे। 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बनना महात्मा गांधी को पसंद नहीं आया तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

डा. अग्रवाल ने कहा कि बोस अंग्रेजों के लिए सबसे खतरनाक व्यक्ति थे। उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजों के दांत खट्टे किए बल्कि देश छोड़कर जाने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए आजाद हिद फौज स्थापित की। नेताजी मानते थे कि दुश्मन का दुश्मन एक मित्र होता है इसलिए हिटलर की मदद से भारत को आजाद कराना चाहते थे। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, दिल्ली चलो और जय हिन्द जैसे नारों से सुभाष ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नई जान फूंकी थी। इन नारों ने सारे भारत को एकता के सूत्र में बांधा।

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