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बीमार पशुओं को मिलेगी राहत, देसी गाय के DNA में मिला 'लंपी' से लड़ने का कवच; NBAGR के रिसर्च में खुलासा 

Published: Tue, 22 Sep 2026 05:56 PM (IST)

राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर) के विज्ञानियों ने देसी गायों में लंपी रोग के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े विशेष आनुवंशिक संकेतों की पहचान की है।

लंपी बीमारी के बाद पशु में कुछ इस प्रकार की गांठें उभर जाती हैं (फाइल फोटो)

लंपी बीमारी के बाद पशु में कुछ इस प्रकार की गांठें उभर जाती हैं (फाइल फोटो)

HighLights

  1. देसी गायों में लंपी रोग प्रतिरोधक क्षमता के आनुवंशिक संकेत मिले

  2. एनबीएजीआर करनाल ने विशेष परियोजना में यह महत्वपूर्ण खोज की

  3. भविष्य में रोग प्रतिरोधी गोवंशियों के विकास की नई उम्मीद जगी

प्रदीप शर्मा, करनाल। लंपी रोग के विरुद्ध देसी गायों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता का राज उनके डीएनए में तलाश लिया गया है।

राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर) के पशु जैव प्रौद्योगिकी प्रभाग के विज्ञानियों ने स्वदेशी गायों में ऐसे विशेष आनुवांशिक संकेतों (जेनेटिक सिग्नेचर) की पहचान की है, जिनका संबंध लंपी विषाणु के संक्रमण के दौरान शरीर की प्रतिरोधक क्षमता से पाया गया है।

वर्ष 2022 से 2024 तक चली विशेष परियोजना में हुए इस अध्ययन से भविष्य में रोग प्रतिरोधी गोवंशियों को तैयार करने की दिशा में नई उम्मीद जगी है।

परियोजना प्रमुख एवं प्रधान विज्ञानी डॉ. रवि कुमार गंधम के नेतृत्व में हुए अध्ययन में विज्ञानियों ने स्वदेशी और विदेशी नस्लों के आनुवंशिक गुणों का विश्लेषण किया।

शोध का उद्देश्य यह समझना था कि लंपी विषाणु के संक्रमण के दौरान विभिन्न नस्लों के पशुओं की प्रतिरोधक क्षमता किस प्रकार प्रतिक्रिया करती है। अध्ययन में मिले विशेष आनुवांशिक संकेत भविष्य में लंपी के प्रति बेहतर प्रतिरोधक क्षमता वाले पशुओं के चयन में मददगार हो सकते हैं।

देसी नस्लों की प्रतिरोधक क्षमता बनी शोध का आधार

लंपी रोग के प्रकोप के दौरान विज्ञानियों ने पाया कि विभिन्न नस्लों की गायों में संक्रमण का प्रभाव एक जैसा नहीं था। कुछ स्वदेशी नस्लों में बीमारी के लक्षण अपेक्षाकृत कम गंभीर रहे या पशु संक्रमण से जल्दी उबर गए।

इसी अंतर ने विज्ञानियों का ध्यान देसी गायों की आनुवांशिक संरचना की ओर खींचा। शोध के दौरान डीएनए में मौजूद उन विशेष आनुवांशिक लक्षणों का अध्ययन किया गया, जिनका संबंध रोग प्रतिरोधक क्षमता से हो सकता है।

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कैप्शन- राष्ट्रीय पशु अनुवांशिकी संसाधन ब्यूरो। संस्थान

इन संकेतों की पहचान से यह समझने में मदद मिलेगी कि अलग-अलग नस्लों में लंपी के प्रति संवेदनशीलता क्यों अलग होती है। हालांकि, इन आनुवांशिक संकेतों की उपयोगिता को व्यापक स्तर पर प्रमाणित करने के लिए आगे और परीक्षण जरूरी होंगे।

आनुवांशिक चयन से बढ़ सकती रोग प्रतिरोधक क्षमता

शोध के निष्कर्षों का उपयोग भविष्य में आनुवांशिक चयन आधारित प्रजनन कार्यक्रमों में किया जा सकता है। जिन पशुओं में लंपी के प्रति बेहतर प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े आनुवांशिक लक्षण पाए जाएंगे, उनके चयन से अगली पीढ़ियों में इन गुणों को बढ़ावा देने की संभावना होगी।

इससे पशुपालकों को स्वस्थ और रोगों से बेहतर ढंग से मुकाबला करने वाले गोवंशियों के विकास में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए बड़े स्तर पर पशुओं पर परीक्षण, अलग-अलग नस्लों में सत्यापन और लंबे समय तक अध्ययन आवश्यक होगा।

लंपी ने दिया था गहरा जख्म

वर्ष 2022 और 2023 में देश के कई राज्यों में लंपी रोग के व्यापक प्रकोप ने पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी थी। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात समेत अनेक राज्यों में गोवंशीय प्रभावित हुए थे।

बीमारी से पशुओं की मौत के साथ दूध उत्पादन में कमी और पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसे में लंपी के खिलाफ आनुवांशिक स्तर पर प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने की दिशा में यह अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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कैप्शन- लंपी रोग से ग्रस्त गोवंशीय। सौ-इंटरनेट मीडिया

जानिये, क्या है लंपी वायरस

लंपी स्किन डिजीज वायरस है। यह गोवंशियों को संक्रमित करता है। मच्छर, मक्खी जैसे खून चूसने वाले कीट संक्रमित पशु से वायरस को दूसरे पशु तक पहुंचा देते हैं। संक्रमण के बाद पशु को बुखार होता है और त्वचा पर कठोर गांठें बनने लगती हैं।

गंभीर संक्रमण में सूजन, कमजोरी, दूध उत्पादन में कमी और अन्य जटिलताएं हो जाती हैं। ये गांठें जख्म में बदल जाती हैं। किसी वायरस से लड़ने की क्षमता केवल बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि पशु के डीएनए में मौजूद कुछ आनुवांशिक बदलाव भी यह तय कर सकते हैं कि उसका शरीर संक्रमण के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देगा।

यह अध्ययन देश के पशुधन को भविष्य में संक्रामक रोगों से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हमने यह समझने का प्रयास किया है कि लंपी विषाणु के संक्रमण के दौरान स्वदेशी और विदेशी नस्लों के आनुवंशिक गुण किस प्रकार प्रतिक्रिया करते हैं। स्वदेशी नस्लों में मिले विशेष आनुवंशिक संकेतों की पहचान से भविष्य में रोग प्रतिरोधी पशुओं के चयन और प्रजनन कार्यक्रमों को वैज्ञानिक आधार मिल सकता है। -डॉ. एनएन मोहन, निदेशक, एनबीएजीआर, करनाल