जागरण संवाददाता करनाल : चमकदार फल सेहत पर केमिकल अटैक कर रहे हैं। खाने वाले को पता चले बिना ही खतरनाक रसायन स्वाद के साथ पेट में लगातार घुसपैठ कर रहे हैं। क्योंकि शहर में ज्यादातर फल कार्बाइड नाम के रसायन का इस्तेमाल कर पकाए जा रहे हैं। जबकि यह केमिकल खाद्य संरक्षा व मानक अधिनियम-2011 की धारा 2.3.5 के तहत बैन है। इसका भंडारण, सेल, मार्केटिग इंपोर्ट करने वालों के लिए सजा का प्रावधान भी है। एक्ट के मुताबिक किसी भी फल को केमिकल लगाकर नहीं पकाया जा सकता। हेल्थ विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बाइड से पकाया गया आम या कोई भी फल शरीर को नुकसान पहुंचाता है। इसके बाद भी शहर में 380 से ज्यादा जगह सरेआम केमिकल से फल पकाए जा रहे हैं। केले और आम के साथ साथ चीकू को भी केमिकल से पकाया जा रहा है।

इसलिए और ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं फल

आम, केला, चीकू जैसे फलों को कम से कम समय में पकाने के लिए केमिकल का प्रयोग हो रहा है। शहर के बाहरी इलाकों में यह काम धड़ल्ले से चल रहा है। यहां अनट्रेंड लोग इस काम में लगे हुए है। उन्हें यह तक नहीं पता कि कितना केमिकल किस फल में कितने वक्त के लिए डाला जाए, जिससे इसका असर कम से कम आए। इस वजह से होता यह है कि वह अक्सर ज्यादा रसासन ही फलों में डाल देते हैं।

हार्टिकल्चर विशेषज्ञ रोहित चौहान ने बताया कि इससे केमिकल का असर फल के अंदर तक आ जाता है। सामान्यता यदि तय मात्रा और समय के लिए कैमिकल से फल पकाए जाए तो यह हानिकारक तो हैं, लेकिन तब इसका असर फसल के छिलके तक ही रहता है। फल के अंदर तक नहीं जाता। इस तरह से यदि फल को छिलका उतार कर खाए तो कुछ हद तक नुकसान से बच सकते हैं।

तो क्या होना चाहिए

विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे पहले तो होना यह चाहिए कि फल प्राकृतिक तरीके से पके। यदि यह संभव नहीं है तो इस बारे में स्टडी होनी चाहिए। बकायदा से एक फार्मूला तैयार होना चाहिए। जिसमें सिर्फ वहीं केमिकल प्रयोग में लाए जाए जिससे नुकसान कम से कम हो। रोहित ने बताया कि इसके लिए एथिलीन का प्रयोग किया जा सकता है। यह कार्बाइड के मुकाबले अधिक सुरक्षित मानी जा रही है। इसके लिए राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड एक समिति बनाने जा रहा है। यह समिति एथिलीन के इस्तेमाल के लिए मानक तैयार करेगी।

यह सुरक्षित क्यों है?

क्योंकि एथिलीन के इस्तेमाल से फल पकाने का एक वैज्ञानिक तरीका है। इसमें न सिर्फ तापमान नियंत्रित करना पड़ता। इसके लिए स्पेशल चैंबर बनाने पड़ते हैं। इसके प्रयोग के लिए प्रशिक्षण व्यक्ति चाहिए। जिसे पूर सिस्टम की जानकारी हो। इस तकनीक से पकाए गए फल अपेक्षाकृत कम नुकसानदायक होते हैं। छोटे शहरों में अभी इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जिला बागवानी अधिकारी मदन लाल ने बताया कि हम इस दिशा में काम कर रहे हैं। कुछ लोगों ने इस तरह के चैंबर बनाए हैं।

जांच का कोई प्रावधान ही नहीं

सीएमओ डाक्टर रमेश ने बताया कि हम इस तरह से फलों की जांच नहीं करते। बस यही देखा जाता है कि फल दूषित न हो। इस तरह के फल बेचने वाले के खिलाफ तो कार्रवाई करते हैं। सीएमओ ने बताया कि फलों का सैंपल उनका विभाग नहीं लेता है।

Posted By: Jagran