जागरण संवाददाता करनाल : मेयर कौन होगा? अब यह निगम के मतदाता तय करेंगे। नई बनी सियासी परिस्थितियों में अब मेयर का चुनाव पहले से थोड़ा मुश्किल हो गया है। क्योंकि मेयर के पद का चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार को अब निगम के हर मतदाता तक पहुंचना होगा। राजनीतिक में पीएचडी कर चुके राजनीति समीक्षक डाक्टर हरबंस लाल ने बताया कि इस निर्णय से राजनीति दलों की दिक्कत बढ़ सकती है। क्योंकि अब एक तो हर पार्टी के लिए अपने निशान पर चुनाव मैदान में उतरना होगा। यदि कोई भी पार्टी इससे बचती है तो उसकी छवि पर इसका विपरीत असर पड़ सकता है। दूसरी समस्या यह है कि मेयर के लिए एक पार्टी एक ही उम्मीदवार उतार सकती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर बगावत होने के आसार बन जाते हैं। जागरण ने इस चुनाव को लेकर राजनीतिक नफे नुकसान, विवाद और इससे हासिल क्या होगा? इसी को लेकर विशेषज्ञों से बातचीत की। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया की संविधान के अनुच्छेद 243 आर 2(बी ) के तहत राज्य सरकारों को पूर्ण अधिकार है कि वो म्यूनिसिपल (शहरी नगर निकाय संस्था) के चुनाव में जैसा चाहे वैसा प्रावधान बना सकती है।

जनता के प्रति मेयर जिम्मेदार होगा

क्योंकि मेयर को सीधे मतदाता चुन रहे हैं। इसलिए उसकी आम मतदाता के प्रति जिम्मेदारी होगी। अब यह कह कर मदताता को टाला नहीं जा सकता कि आपके पार्षद ने विकास की ओर ध्यान नहीं दिया। होगा यह कि सीधा मेयर भी इसके लिए जिम्मेदार होगा। यानि विकास के लिए अब वार्ड में दो प्रतिनिधि जिम्मेदार होंगे। पार्षदों को अपने पक्ष में करने की दौड़ खत्म होगी। पार्षद भी मेयर पर अनावश्यक दबाव नहीं बना पाएंगे। इससे निगम में उनकी दबाव की राजनीति भी कम होगी।

लेकिन यह नुकसान भी होगा

मेयर और पार्षद के बीच विकास को श्रेय लेने की एक नई होड़ शुरू हो सकती है। अभी पार्षदों के पास विकास कार्य पर खर्च की पावर नहीं है। मेयर पीक एंड चूज की नीति अपना सकता है। उनके खिलाफ पार्षद अविश्वास प्रस्ताव नहीं ला पाएंगे। यदि मेयर विपक्षी दल से हो और पार्षद दूसरे दल से हो, ऐसे में निगम में कंट्रोवर्सी रहेगी। मेयर यदि सरकार समर्थित नहीं है तब भी इसी तरह की दिक्कत आ सकती है।

राजनीति पार्टियों को अब सीधे भागीदारी करनी होगी

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि राजनीति दल अब सीधे तौर पर निगम चुनाव में भागीदारी करेंगे। निगम की हार जीत का असर विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में भी पड़ सकता है। इसलिए हर पार्टी के लिए निगम चुनाव में शामिल होना एक तरह से जरूरी सा हो जाता है। समाजशास्त्र में पीएचडी कर रहे शोधार्थी राकेश कुमार ने बताया कि मेयर का एरिया क्योंकि विधायक के निर्वाचित क्षेत्र जितना बड़ा हो जाता है, इसलिए मेयर को भी ज्यादा पावर मिलनी चाहिए। लेकिन इससे विधायक और मेयर के बीच टकराव के आसार भी बन सकते हैं।

सवाल जिनका जवाब अभी आना बाकी है

मेयर पार्षद के तौर पर भी क्या चुनाव लड़ेगा या सिर्फ मेयर के तौर पर। उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में मेयर पार्षद के तौर पर चुनाव नहीं लड़ता। डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर का चुनाव अब कैसे होगा? यदि किसी कारण से मेयर का पद खाली होता है,इस हालात में नए मेयर के लिए उप चुनाव होगा, या दूसरी व्यवस्था होगी।

हिमाचल के शिमला निगम में विपक्षी बन गया था मेयर

हिमाचल में 2010 में भी तत्कालीन प्रेम कुमार धूमल वाली भाजपा सरकार ने शिमला नगर निगम के मेयर के सीधे चुनाव बाबत संशोधन किया था। वर्ष 2012 में तब जब आश्चर्यचकित रहे गए जब सीपीएम पार्टी के संजय चौहान सीधे मेयर और उन्हीं कि पार्टी के टीएस पंवार डिप्टी मेयर निर्वाचित हो गए। अधिकांश पार्षद कांग्रेस और भाजपा के ही निर्वाचित हुए। सीपीएम के केवल तीन पार्षद चुने गए। वर्ष 2016 में तत्कालीन वीरभद्र ¨सह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सीधे मेयर निर्वाचित करने का निर्णय को ही पलट दिया। वर्ष 2017 में शिमला नगर निगम के चुनाव हुए।

विपक्ष बोला निर्णय सहीं, पहलुओं पर करेंगे विचार

पूर्व सीएम भूपेंद्र ¨सह हुड्डा ने कहा कि सरकार का निर्णय सही है। लेकिन इसमें कुछ पहलु है, जिस पर विचार करना बाकी है। पार्टी स्तर पर निर्णय लिया जाएगा कि इसके लिए क्या किया जाना चाहिए। करनाल की पूर्व विधायक सुमिता ¨सह ने कहा कि यह सरकार निर्णय तो खूब लेती है, समस्या यह है कि इनकी पालना होती ही नहीं। देखते है इसमें क्या रहता है। निर्वतमान मेयर ने रेणुबाला गुप्ता ने कहा कि सरकार का यह बहुत ही अच्छा निर्णय है। इनेलो पार्टी से निर्वतमान डिप्टी मेयर मनोज वधवा ने भी सरकार के निर्णय को सही बताया।

Posted By: Jagran

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