करनाल, [मनोज ठाकुर]। धान की खेती को भूजल स्तर गिरने का बड़ा कारण माना गया है। यही वजह है कि इसका रकबा कम करने की बात हो रही है। अब पानी की आधी खपत में धान पैदा किया जा सकेगा। सब-सर्फेस डिप इरीगेशन (उप सतह टपका सिंचाई) तकनीक किसी संजीवनी से कम नहीं है। खासकर धान पैदावार वाले क्षेत्र में यह तकनीक कारगर साबित होगी।

पानी की एक भी बूंद नहीं जाती व्यर्थ, गेहूं व मक्का पर भी हो रहा प्रयोग

क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर मॉडल के तहत सब-सर्फेस डिप इरीगेशन से धान, मक्का और गेहूं की फसल लेने का सफल प्रयोग करनाल स्थित केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान में हो रहा है। पानी की खपत में 50 फीसद और लागत में 20 फीसद की कमी दर्ज की गई है। संस्थान के विज्ञानियों ने दावा किया है कि धान की खेती में 50 प्रतिशत तक पानी की बचत का यह प्रयोग देश में पहली बार किया गया है।

इस तकनीक को क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर में मॉडल के रूप में जोड़ा गया है। इस प्रोजेक्ट में अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र भी सहभाग कर रहा है। यह विधि डिप इरीगेशन का ही आधुनिक स्वरूप है। डिप इरीगेशन में पानी की पाइप लाइन को जमीन की सतह के ऊपर रखा जाता है और सिंचाई के बाद हटा दिया जाता है।

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नई तकनीक में लाइन जमीन की सतह से 15 सेंटीमीटर की गहराई में बिछाई जाती है। यदि धान और गेहूं की फसल लेनी है तो लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर होती है। मक्का और गेहूं की फसल लेनी है तो यह दूरी 65 सेंटीमीटर तक हो जाती है। जमीन के नीचे जो लाइन बिछाई जाती है उसमें हर 20 सेंटीमीटर की दूरी पर छिद्र बनाए जाते हैं ताकि इनसे पानी रिस सके।

किसान एक साल में दो से तीन फसलें लेने के लिए 12 बार खेत की जुताई करता है। गेहूं और धान में 180 किलोग्राम नाइट्रोजन देनी पड़ती है। मक्का में 175 किलोग्राम नाइट्रोजन देनी पड़ती है। लेकिन नई विधि में साल में महज दो बार ही खेत जोतने की जरूरत होती है। कई फसलों में तो इसकी भी जरूरत नहीं होती। इसी तरह, धान में महज 120 किलोग्राम नाइट्रोजन में ही काम चल जाता है, यूरिया को घोलकर पाइपों के जरिये फसलों की जड़ तक पहुंचाया जाता है। मक्का में 145 किग्रा से काम चल जाता है।

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'प्रयोग हुआ सफल'

'' यह प्रयोग सफल रहा है। देश में पहली बार सब-सर्फेस डिप इरीगेशन से धान की फसल उगाई जा रही है। भविष्य में पानी की चुनौतियों को देखते हुए यह तकनीक देश के लिए कारगर साबित होगी। किसान भाई इस तकनीक से धान की खेती करेंगे तो पानी की बचत के साथ-साथ फायदा भी अधिक होगा।

                     - डॉ. एचएस जाट, प्रधान विज्ञानी, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा।

   

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Posted By: Sunil Kumar Jha

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