अश्विनी शर्मा, करनाल

अपनी भावनाओं को समाज के सामने रखने में अक्षम बच्चों के लिए वह किसी फरिश्ते से कम नहीं है। बच्चे भी उन्हें मां का दर्जा देते हैं। वह दिव्यांगों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने की जिद के साथ 26 साल से काम कर रही हैं। 23 साल तक करनाल में कार्य करने के बाद आर्थिक दिक्कत की वजह से उन्हें नीलोखेड़ी में अपनी सोसायटी को लेकर जाना पड़ा। अब वह नीलोखेड़ी में तपन पुनर्वास केंद्र संचालित कर रहीं हैं।

आर्थिक संकट के बाद भी डॉ. सुजाता ने दिव्यांगों का साथ नहीं छोड़ा। पहले की तुलना में बच्चों की संख्या जरूर कम की लेकिन इस राह से खुद को जुदा नहीं किया। तीन साल पहले उनके पास 250 दिव्यांग बच्चे केंद्र में थे। करनाल के चमन गार्डन में किराए के भवन में संचालित हो रहे केंद्र को छोड़ना पड़ा।

किसी से कोई मदद नहीं मिली तो नीलोखेड़ी में एक संस्था ने जमीन लीज पर दी। फिर यह केंद्र करनाल से नीलोखेड़ी शिफ्ट हो गया। इसके बाद बच्चों की संख्या भी कम करनी पड़ी। अब उनके पास 150 बच्चे हैं। सरकार की ओर से सोसाइटी को संचालित करने के लिए जमीन देने की घोषणा हुई थी। बावजूद इसके जमीन अलॉट नहीं होने से उन्हें दिक्कत आई। दूसरा वह शहर के अंदर किसी बड़े भवन का किराया देने में सक्षम भी नहीं हैं। अलबत्ता बच्चों की संख्या कम करके ही सही लेकिन दिव्यांगों के लिए काम जारी रखने का निर्णय लिया गया।

मूल रूप से पंजाब के जालंधर की रहने वाली डॉ. सुजाता ने समाजसेवा में अपना कार्य क्षेत्र करनाल को ही बनाया हुआ है। वह पंजाब विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में पीएचडी हैं। उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जबकि तीन पुस्तकें प्रकाशन के लिए तैयार हैं। युवतियों को स्वरोजगार से जोड़ने की दिशा में भी कार्य करती हैं। करनाल में सोसाइटी संचालित करते हुए उन्होंने स्लम एरिया की युवतियों को सिलाई कढ़ाई व ब्यूटी पार्लर का प्रशिक्षण देने का कार्य शुरू किया था। प्रशिक्षण लेने के युवतियों ने अपने घर में काम शुरू कर दिया। इससे उन्हें आर्थिक स्वावलंबन मिला।

डॉ. सुजाता का कहना है कि आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हुए सोसायटी का संचालन किया जा रहा है लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी।

By Jagran