पंकज आत्रेय, कैथल। कैथल, हरियाणा के फर्श माजरा गांव निवासी किसान की यह कहानी प्रेरणादायी है। पराली प्रबंधन को कारोबार का रूप दिया और महज एक साल में दो करोड़ रुपये की कमाई कर डाली। इस सीजन में दो महीने में 50 लाख रुपये की आय हो चुकी है। दो सौ युवाओं को रोजगार भी दे रहे हैं। आस्ट्रेलिया जा बसे युवा ने जब स्वदेश लौटकर खेती शुरू की, तो पराली की समस्या सामने आई। किंतु इसे जलाने की जगह ऐसा समाधान खोजा कि क्षेत्र के किसानों के लिए मिसाल बन गए। फसल-अवशेषों के प्रबंधन को कारोबार का रूप दिया और सफलता का नया मंत्र दे डाला।

32 वर्षीय वीरेंद्र यादव को आस्ट्रेलिया की स्थायी नागरिकता मिल चुकी थी। लेकिन उनका वहां मन नहीं लगा। अंतत: पत्नी और दोनों बेटियों को लेकर गांव लौट आए। यहां आकर पैतृक खेती शुरू की। फसल अवशेष के निपटान की समस्या सामने आई। वहीं, जब पराली को जलाने से उठने वाले प्रदूषण ने दोनों बेटियों की सेहत को आफत में डाल दिया, तो कुछ करने की ठानी।

वीरेंद्र की दोनों बेटियों को प्रदूषण के कारण एलर्जी हो गई। वह बताते हैं, तब मैंने गंभीरता से सोचा कि आखिर इस समस्या का बेहतर समाधान कैसे हो सकता है। जब पता चला कि पराली को बेचा जा सकता है, तो इसमें जुट गया। वीरेंद्र ने क्षेत्र में स्थित एग्रो एनर्जी प्लांट और पेपर मिल से संपर्क किया तो वहां से पराली का समुचित मूल्य दिए जाने का आश्वासन मिला। तब उन्होंने इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया। न केवल अपने खेतों से बल्कि अन्य किसानों से भी पराली खरीकर बेचने का काम उन्होंने शुरू किया। इसमें सबसे जरूरी था पराली को दबाकर इसके सघन गट्ठे बनाने वाले उपकरण का इंतजाम, ताकि परिवहन आसान हो जाए। इसके लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग से 50 प्रतिशत अनुदान पर तीन स्ट्रा बेलर खरीदे। अब सप्ताह भर पहले चौथा बेलर भी खरीद लिया है। एक बेलर की कीमत 15 लाख रुपये है। बेलर पराली के आयताकार गट्ठे बनाने के काम आता है।

वीरेंद्र बताते हैं कि दो माह के धान के सीजन में उन्होंने तीन हजार एकड़ से 70 हजार क्विंटल पराली के गट्ठे बनाए। 135 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से 50 हजार क्विंटल पराली गांव कांगथली के सुखबीर एग्रो एनर्जी प्लांट में बेची। 10 हजार क्विंटल पराली पिहोवा के सैंसन पेपर मिल को भेज चुके हैं और 10 हजार क्विंटल पराली के लिए इसी पेपर मिल से दिसंबर और जनवरी में भेजने का करार हो चुका है। इस तरह इस सीजन में अब तक उन्होंने 94 लाख 50 हजार रुपये का कारोबार किया है। इसमें से खर्च निकालकर उनका शुद्ध मुनाफा 50 लाख रुपये बनता है। जनवरी तक और भी कमाई होगी।

वीरेंद्र ने बताया कि उनके परिवार के पास महज चार एकड़ जमीन है। उनके हिस्से में इसमें से एक एकड़ आती है। पिता पशुपालन विभाग से सेवानिवृत हैं। लिहाजा परिवार के पास आय का कोई अन्य साधन नहीं था। इसीलिए सन 2008 में आस्ट्रेलिया चले गए थे। 2011 में शादी के बाद पत्नी को भी साथ ले गए। वहां फल-सब्जियों का थोक कारोबार करते थे। सालाना 35 लाख रुपये की कमाई थी। इस दौरान उन्हें वहां की स्थायी नागरिकता भी मिल गई। लेकिन फिर 2017 में घर लौट आए।

यहां खेती शुरू की और फिर पराली प्रबंधन का काम शुरू करने का विचार आया तो कृषि विभाग के अधिकारी पुरुषोत्तम लाल और सहायक कृषि अधिकारी डॉ. सज्जन सिंह ने प्रोत्साहित करके नवंबर, 2019 में एक स्ट्रा बेलर लेने की सलाह दी। आज उनके पास ऐसे चार स्ट्रा बेलर सहित कुल डेढ़ करोड़ रुपये की मशीनरी है, जिससे वह पराली प्रबंधन का काम करते हैं। वह बताते हैं कि एक सीजन में ही उनका सारा निवेश वापस मिल गया था।

कैथल के कृषि विभाग के एडीओ डॉ. सज्जन सिंह ने बताया कि युवा किसान वीरेंद्र यादव का जज्बा वाकई मिसाल है। स्ट्रा बेलर पर सरकार की अनुदान राशि का फायदा दूसरे किसान भी उठा सकते हैं। उन्हें वीरेंद्र से प्रेरणा लेनी चाहिए, जिन्होंने अपनी सूझबूझ से पराली को कमाई में बदल लिया है।

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