जागरण संवाददाता, कैथल: प्रेमाश्रु जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। साई के प्रेम में, उनको पाने के लिए हृदय से बहे अश्रु जीवन की सारी दुख तकलीफों को अपने साथ बहा ले जाते हैं। साई को पाने की जद्दोजहद में इंसान के सारे पूर्वजन्मों में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। सारे के सारे भाव, विचार और तदनुसार कर्मों का केंद्र बिदु केवल साई बन जाते हैं। यह विचार कथावाचक सुमित भाई पौंदा भोपाल वाले ने श्री शिरडी साई शरणम् धाम संस्था कैथल द्वारा आयोजित श्री साईं अमृत कथा के तीसरे दिन श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। सुमित पौंदा ने कहा कि जब केंद्र में केवल साई रहते हैं तो यह नितांत असंभव है कि पूर्व में किए गए कर्मों का फल हमें सुख अथवा दु:ख की अनुभूति भी करवाए। पूर्व के साथ वर्तमान कर्म भी सध जाते हैं और सुंदर भविष्य की नींव रखते हैं। हर कर्म साई की उपस्थिति में, उन्हीं को समर्पित कर देने से कर्मों का स्वरूप बदल जाता है। जो व्यक्ति सदैव दूसरों के दोष देखता रहता है वो अपने में भी बुराई देखने का दोषी होता है। उसका दोष यही है कि वह बेवजह किसी और में गुण न देख कर नकारात्मक पक्ष देख रहा होता है और वह हमेशा अपनी कमियां छिपाने के लिए ही यह करता है। नकारात्मक देखने वाला नकारात्मक शक्तियों को आकर्षित करता है। ऐसा व्यक्ति कभी किसी का अच्छा होता भी नहीं देख सकता। सकारात्मकता रखने वाला सदा सकारात्मकता को खोजता है।

कथावाचक सुमित पोंदा ने कहा कि हमें जीवन में सभी तरह के लोगों से वास्ता पड़ता है। कुछ को आपसे कोई फर्क नहीं पड़ता तो कोई आपकी प्रशंसा करते हैं और कुछ निदा। यह बहुत साधारण है। जो हमसे अप्रभावित रहते हैं, उनसे अपने प्रति कुछ भी सुन पाना असंभव सा होता है। इस अवसर पर श्री शिरड़ी साई शरणम धाम संस्था के प्रधान मुकेश चावला, नवीन मल्होत्रा, बख्शीश गिरधर, कृष्ण सलूजा, सीपी अरोड़ा, अनिल सलूजा, भारत खुराना, राम नारायण शर्मा आदि मौजूद रहे।

Posted By: Jagran

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