जागरण संवाददाता, कैथल : खेतों में बचे धान के अवशेष जलाने से न केवल पर्यावरण प्रदूषित होता है, बल्कि जमीन की उपजाऊ शक्ति भी कमजोर होती है। किसानों को धान के अवशेष जलाने की बजाए नष्ट करने चाहिए। इसके साथ ही किसान पराली के माध्यम से चारे के लिए फैक्ट्रियों में इसे अच्छे रुपये में बेच सकते हैं। इससे जहां जमीन की उपजाऊ शक्ति बढ़ेगी, जबकि किसान सरकार की ओर से दर्ज किए जाने वाले केस भी बचेगा। यह कहना है कृषि विज्ञानी ईश्वर सिंह कुंडू का।

कुंडू ने बताया कि हरियाणा में सबसे अधिक गेहूं और धान की फसल उगाई जाती है। इस फसल से ही पराली होती है। धान की पैदावार के बाद पराली सबसे अधिक होती है। इस सीजन में ही किसानों की ओर से पराली को जलाया जाता है, लेकिन प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जहां किसानों को जागरूक किया जाता है। वहीं उन पर केस दर्ज भी होता है। इससे अच्छा है कि किसान धान की कटाई के बाद पराली को न जलाकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें। कुंडू ने बताया कि कुछ किसान पराली न जलाने के लिए बहानों को बनाते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। वे सरकार का सहयोग कर, धान की सीधी बिजाई करें और इसके बाद कटाई के समय में पराली न जलाएं। इसके साथ ही वे पराली को जलाने के बजाय उन्हें बेचकर भी इसे अपनी आय का साधन बनाएं। कृषि विभाग के अधिकारियों को भी गांव-गांव में जागकर किसानों को धान के बचे अवशेषों को जलाने से होने वाली नुकसान और न जलाने पर होने वाले फायदों के बारे में प्रेरित करना चाहिए। विज्ञानी ईश्वर कुंडू ने बताया कि धान के बचे अवशेष नहीं जलाकर किसानों को अपनी खाद का खर्चा भी बचाना चाहिए, यदि किसान धान के बचे अवशेष को न जलाकर उसी बिक्री करेगा तो खेतों में डाले जाने वाले खाद का खर्च भी निकल सकेगा। किसान खेतों में अवशेष जलाते हैं, तो सड़कों से निकल रहे वाहन चालक भी धुआं होने के चलते सड़क हादसे का शिकार होते हैं। पूर्व में कई हादसों में लोगों की जान भी जा चुकी है, इसलिए किसान जागरूक होते हुए सरकार और जिला प्रशासन की तरफ से चलाए जा रहे अभियान में भाग लेकर अवशेष जलाने की बजाए खेतों में नष्ट करने के लिए आगे आएं।

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