संस, कलायत: गर्मी के दस्तक के साथ ही कुंभकारों के आंगन में गरीब का फ्रिज कहे जाने वाले मटकों को बनाने का कार्य शुरू हो गया है। भले ही आज कुंभकारों के पास मिट्टी के बर्तन तैयार करने और इन्हें पकाने के लिए वाजिब स्थान का अभाव है। बावजूद इसके मिट्टी के बर्तनों की चाह रखने वालों की मांग पूरा करने और घर का चूल्हा जलाने के लिए कुंभकार विपरीत परिस्थितियों से गुजरते हुए दस्तकारी को जिदा रखे हैं। मिट्टी के बर्तनों की अपनी एक खास जगह है। मिट्टी से बने मटके फ्रिज की भांति पानी को ठंडा रखने का काम करते हैं। घड़े के पानी में गले को तर करने के साथ-साथ मिट्टी की सौंधी खुशबू घुली होती है। कई साल पहले मटकों की इतनी मांग रहती थी कि कुभकारों के घर से मटका लेने के लिए लोगों की कतार लगती थी। लगभग 12 से 15 साल पहले चाक पर दीपक, मटकी, सुराही और कुल्हड़ बनाया करते थे। बदलते दौर के कारण मिट्टी के बर्तन की डिमांड घटी। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले महेंद, दीपक और विद्या देवी ने बताया कि विरासत में मिले इस धंधे को चलाने के लिए उसका परिवार जुटा हुआ है।

Posted By: Jagran

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