जागरण संवाददाता, कैथल : योग शिक्षिका ओम योग सेंटर की संचालक संध्या आर्य ने बताया कि नियंत्रण ही प्राणायाम कहलाता है। अथवा श्वास प्रश्वांस की गति का विच्छेद करना प्राणायाम कहा जाता है। हमारे शरीर में जो भी गति या चेष्टा होती है, वह प्राण द्वारा ही संचालित होती है। यह प्राण सारे शरीर में फैला हुआ है। इसकी तुलना शक्ति विद्युत से की जा सकती है। यह शक्ति हमें वायु द्वारा प्राप्त होती है। वायु भोजन पेय-पदार्थ एवं सूर्य का प्रकाश माध्यम है। इनके द्वारा हमे प्राण शक्ति प्राप्त होती है। यहां प्राणायाम से अभिप्राय: श्वसन कार्य में प्रयुक्त प्राण का नियंत्रण करना है।

शरीर में नाभि से ऊपर की क्रियाएं प्राण और नाभि से नीचे के अपान द्वारा संचालित होती है। प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान, नाग, कुर्म, कृकल देवदत्त और धनंज्य ये प्राण के दस भेद हैं। इन सबको प्राण ही कहा जाता है। ये वायु के सत्वगुण से युक्त हैं। केवल प्राणायाम से भी शरीरस्थ दोषों की निवृति हो जाती है।

मन की चंचलता पर काबू पाने के लिए प्राणायाम अमोघ अस्त्र है। पाववृत्ति और बुरे विचार प्राणायाम से चकनाचूर हो जाते हैं। प्राणायाम की त्यारी आसन यद्माश्न या सिद्वासन प्राणायाम के उपयुक्त साधन हैं। नीचे कुशा का आसान कोई ऊनी कपड़ा सर्द मौसम में एवं कोई सूती कपड़ा गर्म मौसम में बिछाकर बैठना चाहिए। ताकि उत्पन्न होने वाली ऊर्जा भूमिगत ना होने पाए।

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अभ्यास से ही संभव

गहरा लंबा श्वास अथवा श्वास प्रश्वास का अभ्यास शरीर की स्थिरता मन की तन्यता एवं मुख की प्रसन्नता के अभ्यासों के लिए सतत आवश्यक है। इस अभ्यास से ही संभव है।

विधि

पद्मासन में बैठें दोनो हाथ ज्ञान मुद्रा में रखें। कमर व गर्दन सीधी रखें। आंखें कोमला से बंद कर लें। धीरे धीरे श्वास को बाहर निकालना प्रारंभ करें। अंत में पेट की मांसपेशियों का संकोचन करें। नाभि मूल को प्रयास पूर्वक कंठ तक भरें। यह एक आवृति अथवा अभ्यास हुआ। इसी प्रकार और आवृतियां करते जाएं।

Posted By: Jagran

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