जागरण संवाददाता, कैथल:

फसल अवशेष प्रबंधन के लिए किसान भी जागरूक होना शुरू हो गए है। किसान अब धान के अवशेष जलाने की जगह उसे मिट्टी में मिलाकर खाद तैयार कर रहे है। विभाग की तरफ से किसानों के लिए स्मैम स्कीम शुरू की हुई है। इसके तहत किसानों को कृषि यंत्र दिए जा रहे है। किसानों का कहना है कि जब से अवशेष जलाना बंद किया है, तब से फसल में पेस्टीसाइड का प्रयोग कम हो रहा है। पानी की लागत कम हुई है।

पर्यावरण में हुआ सुधार

किसान रविद्र ने बताया कि अवशेष ना जलाने से वातावरण में भी काफी हद तक सुधार हुआ है। अवशेष जलाने से धुआं निकलता था। अवशेष को आग लगाने के साथ जहां जमीन की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है, वहीं वातावरण भी प्रदूषित होता है। कहा कि धान के अवशेष को आग न लगाकर इसको जमीन में मिला देना चाहिए। इससे जमीन की उर्वरता शक्ति में भी बढ़ोतरी होती है।

पराली ना जलाने से कम हुई खाद की जरूरत

किसान शमशेर सिंह पाई ने बताया कि अवशेष ना जलाने से खेतों की उपजाऊ क्षमता बढ़ गई है। अब उनके खेतों में 60 प्रतिशत कम खाद का इस्तेमाल होता है। उन्हें देखकर गांव के और किसानों को हौसला मिला है। उन्होंने भी अवशेषों को जलाना बंद कर दिया है। अवशेष जलाना बंद करने से गांव के लोगों को भी काफी फायदा हुआ है और उन्हें बेहतर उत्पादन भी मिल रहा है।

खेत की मिट्टी में दबाने से फायदा

किसान शमशेर सिंह ने बताया कि खेत में अवशेष जलाने से मिट्टी में मौजूद मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं। साथ ही जमीन की ऊपरी सतह पर उपलब्ध उर्वरा शक्ति भी क्षीण हो जाती है। इससे अगली फसल में किसानों को ज्यादा खाद और सिचाई करनी पड़ती है। उससे फसल की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में अवशेष खेत में जलाने की बजाय मिट्टी में दबा देना चाहिए। इससे वह पराली मिट्टी में सड़ कर कार्बनिक खाद का काम करती है। जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है।

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