जागरण संवाददाता, बहादुरगढ़ :

गोधन सेवा समिति बहादुरगढ़ द्वारा संचालित गो एवं वन्य उपचार केंद्र में डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने गाय के वैदिक और आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि गोकृपा और गाय के दूध-दही गोमूत्र के सेवन करने से यदि अनेक रोगों की निवृत्ति हो जाती है और निरोगी मानव नित्य सहज में ही पंचगव्य का सेवन करता है तो रोग आएंगे भी नहीं। बाह्य रोगों की बात ही नहीं, भीतर के भी अनेक विकारों से जुड़ी समस्याएं जो रोग से कम नहीं उनका भी समाधान मिल जाता है। सच्चाई है कि हमारी सारी समस्याएं रजोगुणी और तमोगुणी मनोवृत्ति की उपज हैं। विश्व स्तर से लेकर हमारे घर तक के युद्ध अथवा झगड़े इसी तमोगुणी आसुरीवृत्ति के कारण होते हैं। महाभारत के भीषण युद्ध में श्रीकृष्ण स्वयं खड़े रहकर टकराव को नहीं टाल पाए। वहां मुख्य-मुख्य राजा आसुरी भाव से जुड़े थे। उन सबकी सोच ही छीना झपटी और टकराव की थी। गोसेवा से अभिप्राय है हमारा सात्विक भाव बढ़े, तभी आसुरी स्वभाव समाप्त होगा। इसीलिए कहते हैं कि गोमाता के रोम-रोम में करें देवता वास। देवता से अभिप्राय दिव्य चैतन्य भाव से है। यदि देखा जाए तो उपहार के रूप में देने लायक आज के समय में छाछ ही है जो देवताओं को भी दुर्लभ है। यह दुखद सत्य है कि आज गाय का वैदिक आध्यात्मिक और मनोविज्ञान लुप्त हो रहा है। इस कारण गाय के प्रति सम्मान-गोसेवा में बहुत कमी आ गई है। हमारा सात्विक भाव नष्ट हो रहा है। तभी तो परस्पर टकराव का वातावरण बनता जा रहा है। इसीलिए सात्विक भाव बढ़े और आसुरी दुर्भाव घटे, इसके लिए गोसेवा सर्वोत्तम साधना है। वैदिक विधि से गौशाला के प्रांगण में ही वेदमंत्रों के साथ वैदिक ब्राह्मणों द्वारा बालक अद्वैत चावला का मुंडन हुआ गोशाला में अमित आर्य, रमेश राठी, कृष्ण चावला, विजेंद्र राठी,राजा जून साहिल चावला, प्रवीण अरोड़ा और मधुर अरोड़ा ने दिव्यानंद महाराज का अभिनंदन किया।

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