मनोज कौशिक, हिसार : जरा सोचिए, जो चीज आपके किसी काम की नहीं और कबाड़ बन चुकी हैं। वहीं चीजें किसी के लिए रिकार्ड बनाने का संसाधन हैं। रिकार्ड भी ऐसे जिनके बारे में जान हर कोई अपने दांतों तले अपनी उंगलियां दबा ले। बात सुनने में भले ही अजीब लगे मगर भिवानी जिले के योगेश बरनेला ने इसे सच साबित कर दिखाया है। सूक्ष्म चीजों से नायाब उत्पाद बनाने के शौक ने योगेश के अंदर ऐसा हुनर पैदा किया कि उन्होंने कई रिकार्ड अपने नाम कर डाले। लिमका बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज कुल 11 रिकार्ड में से दुनिया का सबसे छोटा चरखा बनाना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। एक निजी स्कूल में आर्ट एंड क्राफ्ट टीचर के पद पर कार्यरत योगेश बताते है कि उन्हें तीसरी कक्षा से ही कलाकृतियां बनाने का शौक रहा है। उनका छोटी उमर में ही रॉ मेटेरियल से ही ऐसी चीजें बनाना सबको हैरत में डाल देता है। साल 2011 में योगेश ने शौक को रिकार्ड में तब्दील करना शुरू कर दिया। इसके बाद उन्हें हांगकांग से ऑनलाइन प्रतियोगिता में प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया। तो इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड में भी उन्होंने अपनी जगह बनाई। मगर हैरत की बात ये है कि इतनी उपलब्धि होने के बावजूद योगेश को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकी। योगेश ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि आर्थिक सहायता नहीं मिलने से वो बहुत से रिकार्ड बनाने से चूके हैं।

ये हैं लिमका बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज उपलब्धियां

- दुनिया का सबसे छोटा चरखा, साइज 6.6 एमएम।

- सूक्ष्म मोटर बोट, साइज 5.8 से.मी. - सूक्ष्म पॉवर हीटर, साइज 1 सेमी

- वाटर रॉड, साइज 2. 7 सेमी

- मिट्टी के बर्तन बनाने का पॉटर व्हील, साइज 9.1 सेमी

- दूध मथने की मधानी, साइज 5.8 सेमी,

- थर्मोकोल काटने की मशीन, साइज 7.1 सेमी

- बैंच ग्राइंडर, टूल की धार तेज करने की मशीन, साइज 6 सेमी

- इलेक्ट्रोनिक डोर बैल, साइज 4.3 सेमी

- धूल-मिट्टी साफ करने की ब्लोवर मशीन, साइज 7.2 सेमी

- लकड़ी काटने की मशीन, साइज 8.3 सेमी

नोट- सभी उत्पाद वर्किंग कंडिशन में है, जिन्हें वेस्ट मेटेरियल से बनाया गया है।

ये नायाब कृतियां देख हर कोई कह उठा, वाह

पुराने रेलवे टिकटों हवाई जहाज बना चुके योगेश बताते है कि पिताजी बिजली विभाग में एसडीओं के पद पर सिरसा में कार्यरत थे। वे रेल से अप डाउन करते थे तो योगेश पुरानी टिकटों को इकट्ठा कर लेते थे। इन्हीं से एक हवाई जहाज भी बनाया गया है। जिसका साईज 1.25 फुट है। सीमेंट सें बनाया गया बंदर ऐसा दिखता है जैसे उसमें जान फूंक दी गई हो। वही माचिस की तिल्लियों और झाडू की तिल्ली से एफिल टावर बनाया गया है। जो 1.5 फुट का है। वहीं योगेश ने एक अन्य एफिल टावर भी बनाया है। जिसको 40 हजार माचिस की तिल्लियों से बनाया गया है। इसे बनाने में दो साल लगे और इसका साइज पांच फुट दस इंच है। थर्मोकोल से ताजमहल 3.5 फुट का जिसे बहुत ही छोटे थर्मोकोल के टूकडों को जोड़कर बनाया गया है। इसे बनाने के लिए उन्हें सेंटर से दो लाख रुपये फैलोशिप भी मिली। अपने ही रिकार्ड तोड़ने में माहिर हैं योगेश

योगेश बताते हैं कि वेस्ट उत्पादों को वो काटकर या घिसाकर आकार देते हैं। उसके बाद सूक्ष्म चीजें बनाते हैं। दुनिया के सबसे छोटे चरखे को स्टील वायर,धागे, प्लास्टिक वायर व माचिस की तिल्लियों से बनाया गया है। यह सूत भी कातता है। इस चरखे को देखने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को भी लेंस का प्रयोग करना पड़ा था और इस को देखते हुए भूपेंद्र हुड्डा में योगेश को पुरस्कार व एक लाख रुपये देने कि घोषणा भी कि थी। इसे पहले अहमदाबाद के नरेंद्र पाटिल ने 17 एमएम का चरखा बनाकर इंडिया बुक ऑॅफ रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाया था। लेकिन योगेश ने इस रिकार्ड को तोड़कर पहले 10 एमएम का चरखा बनाया और फिर अपना ही रिकार्ड तोड़कर 6.6 एमएम का चरखा बना डाला।

गुरू से सीख शिष्यों ने भी रचा कारवां

शिक्षक योगेश ने बताया कि आर्ट एंड क्राफ्ट को लोग महज एक स्ट्रीम मानकर अनदेखा कर देते हैं। मगर ये बारीक और कलात्मक काम है। इसमें स्कोप भी बहुत है, मगर इस ओर सरकार और समाज का ध्यान नहीं है। मगर वो अपनी प्रतिभा को निजी स्कूल में अपने शिष्यों सीखा रहे हैं। यही कारण है उनके चार स्टूडेंटस ने भी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में इनाम पाया है।

Posted By: Jagran

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