अग्रोहा (हिसार), सुनील सेन। क्षेत्र के गांव किराड़ा की महिला सरंपच विमला सैनी नारी शक्ति की मिसाल बन गई हैं। इस 'ट्रैक्‍टर वाली' सरपंच ने अपने हौसले और बेमिसाल संघर्ष से मुसीबतों के पहाड़ को बौना कर दिया। वह सिर पर चुन्‍नी बांध कर ट्रैक्‍टर से खेतों की जुताई करती नजर आती हैं तो गांव का भी मां की तरह ध्‍यान रखती हैं। उनका जीवन मुश्किलों से संघर्ष की कहानी है। उनके जज्‍बे को देखकर ही गांव वालों ने अपना सरपंच चुना।

बिमला सैनी की कहानी बेहद खास है। उन्होंने पति की मृत्यु के बाद हालातों से समझौता नहीं किया बल्कि संघर्षों की एक फेहरिस्त खड़ी कर दी। खास बात यह है कि बिमला के संघर्षों से लोग इतने प्रभावित हुए कि उन्हें गांव सरपंच तक बना दिया। वह खुद खेती करती हैं।

 गांव किराड़ा के ग्रामीणों बिमला से प्रभावित होकर बनाया सरपंच

सिर पर चुन्नी बांधकर ट्रैक्टर चलाती खेतों में दिखती हैं और कभी पंचायत में बैठकर अहम फैसले लेती दिखाई देती हैं। लेकिन, बिमला के लिए पहले यह सब कुछ आसान नहीं था, न उन्हें कोई अनुभव था। उनके एक फैसले ने जीवन की दिशा को नया रूप दिया। अब वह अपनी खेती और बच्चों व गांव को बराबर का प्यार करती हैं।

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जानिए की अनोखी कहानी

बिमला सन 1977 में महज 11 वर्ष की आयु में गांव सीसवाल से अग्रोहा ब्लॉक के गांव किराड़ा में सजन सैनी के घर दुल्हन बन कर आईं थी। शादी के बाद बिमला को दो बेटे और तीन बेटियां हुईं। कुछ साल बाद पति की मौत हो गई और इसने बिमला के जीवन को झकझोर के रख दिया। पति की मौत के बाद परिजनों से बिमला के हिस्से आने वाली जमीन पर विवाद होने लगा।

अपने छोटे-छोटे पांच बच्चों का लालन-पालन करना, ऊपर से परिवार के लोगों से प्रतिदिन जमीनी विवाद में थाने-तहसील में हाजिर होना पड़ता था। परिवार के लोगों ने हालात ऐसे पैदा कर दिए कि या तो बिमला सब कुछ छोड़ कर अपने बच्चों के साथ मायके चली जाए या अपनी ससुराल में रहकर हालातों का सामना करती। ऐसे में बिमला ने अपने बच्चों के हक के लिए संघर्षों से जूझना स्वीकार किया। हालांकि परिवार के लोगों ने बहुत यातनाएं दीं लेकिन बिमला ने हार नहीं मानी। 

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जब कोई खेत जोतने वाला नहीं मिला तो खुद की खेती  

परिवार के लोगों ने जब उनके खेत में किसी को भी ट्रैक्टर ले जाने नहीं दिया। कोई उसके खेतों को जोतने वाला नहीं मिला तो बिमला ने अपनी जमीन बचाने के लिए खुद खेती करने की ठानी। सबसे पहले अपने खेत जोतने के लिए एक ट्रैक्टर लिया और उसको चलाना सीखा। धीरे-धीरे खुद ही ट्रैक्टर से अपने खेतों को जोतना, कटाई-कढ़ाई का काम करने लगीं। इतना ही नहीं उन्‍हाेंने हौसला दिखाते हुए अपनी फसल को ट्राली में भरकर खुद ही मंडी तक भी पहुंचाना शुरू किया। आज बिमला की उम्र करीब 53 साल है। वे आज भी अपने बेटों के साथ खेती करतीं हैं।

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संघर्ष कर ग्रामीणों और स्वजनों से पाया सम्मान

अपने छोटे बच्चों के साथ खेती करना, उनकी शिक्षा का प्रबंध करना, इसके साथ सालों तक जमीनी विवाद में थाने-कचहरियों के चक्कर लगाना, लेकिन बिमला ने हार नहीं मानी। इसी बात को देखकर गांव वालों के साथ परिवार के लोगों ने भी बिमला के संघर्षों को देखते हुए उसका सम्मान करना शुरू कर दिया।

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गांव वालों ने बनाया सरपंच

बिमला पढ़ी-लिखी नहीं हैं लेकिन खेती के काम से समय निकाल कर अक्षरों को जोड़-जोड़ कर पढऩे लगीं। वह हस्ताक्षर करना सीख गईं। गांव में बेटियों की शिक्षा को बढ़ाने की बात हो, चाहे किसानों की समस्या की बात हो या बिजली, पानी आदि मूल समस्या हों, हर बात को बिमला ने जोर-शोर से उठाया। इसी बात से प्रेरित होकर गांव ने एकजुटता दिखाते हुए उसे 2010 में गांव का सरपंच बना दिया।

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गांव में होते थे फैसले, पांच साल कोई थाने नहीं गया

बिमला के सरपंची के कार्यकाल के दौरान पांच साल तक गांव का कोई व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर थाने में नहीं गया। सरपंच बिमला चाहे मामला छोटा हो या बड़ा, हर मामले को आपसी भाईचारे से गांव में ही मौजिज लोगों के बीच हल करवा देती थीं। बिमला सैनी ने अपने कार्यकाल में बिजली, पानी, खेतों के खाले, नालों सहित हर घर तक पीने का पानी पहुंचाया। इसके साथ गांव में घर-घर सर्वे करवा बुजुर्गों को पेंशन योजना में शामिल करवाया।

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बेटों को है मां पर गर्व

आज बिमला के दोनों बेटे अजय और रविशंकर जवान हो गए हैं। उनकी शादी हो चुकी है और बिमला दादी भी बन चुकी हैं। दोनों बेटे अपनी मां के संघर्षों को याद कर नम आंखों से कहते हैं, उन्हे अपनी मां पर गर्व है जिसने प्रतिकूल हालातों में उन्हें पाला।

Posted By: Sunil Kumar Jha

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