ओपी वशिष्ठ, रोहतक: हरियाणा की एक फैशन डिजाइनर ने संकल्प शक्ति से किसानों और महिलाओं की आय बढ़ाकर कई परिवारों में समृद्धि की राह प्रशस्त की है। अंतरराष्ट्रीय फैशन डिजाइनर ललिता चौधरी ने देश में लुप्तप्राय खाकी कपास (ब्राउन काटन) को खोज निकाला है। अंतरराष्ट्रीय मार्केट में मांग को देखते हुए खाकी कपास का दोबारा उत्पादन भी शुरू कर दिया है ताकि कृषि में बदलाव कर किसान मुनाफा कमा सकें। इसके पहले ललिता प्राचीन समय में प्रयोग होने वाले रेजा फैब्रिक को भी पुनर्जीवित कर चुकी हैैं। आधुनिक रूप मिलने से इसकी मांग भी बढऩे लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में हथकरघा और हैंडलूम पर महिलाओं को काम मिलने से उनके लिए स्वरोजगार की राह खुल गई है। इस तरह ललिता चौधरी स्किल इंडिया और स्वरोजगार के जरिये गरीबी उन्मूलन में सक्रिय योगदान दे रही हैैं।

खाकी कपास कभी होती थी खूब पैदावार

हरियाणा में खाकी कपास की खूब पैदावार होती थी। खाकी कपास की तासीर गर्म होने के कारण सर्दी में रजाई और बच्चों के कपड़े तैयार किए जाते थे लेकिन धीरे-धीरे इसकी मांग घटती गई और खाकी कपास का वजूद भी खत्म होता चला गया। ललिता चौधरी बताती है कि 1980 में आखिरी बार खाकी कपास की फसल हुई थी। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी अच्छी-खासी मांग और कीमत है।

ऐसी दिखती है हरियाणा में पैदा होने वाली खाकी कपास। सौ. ललित चौधरी

ऐसे की खाकी कपास की खोज

ललिता ने बताया कि उनके घर में वर्षों पुरानी संदूक में एक रजाई मिली थी। जिसकी रुई को देखा तो वह भूरे रंग की थी। पहले तो लगा कि पुरानी होने की वजह से सफेद रुई भूरी (ब्राउन) हो गई है। खाकी कपास का पता लगाने के लिए उन्होंने हरियाणवी संस्कृति और धरोहर पर काम कर रहे डा. रामफल चहल से संपर्क किया। डा. रामफल ने बताया कि 1980 तक हरियाणा में खाकी कपास किसान उगाते थे, लेकिन बाद में यह लुप्त हो गई। उन्होंने खाकी कपास की विशेषता के बारे में जानकारी दी। तब इसे पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया गया, लेकिन खाकी कपास के बीज बाजार में उपलब्ध नहीं हुए। लोगों से संपर्क किया तो एक व्यक्ति के पास इसके बीज मिल गए। फिर डा. रामफल चहल ने राजस्थान के बीकानेर में बीज रोपे और इससे करीब 150 पौधे तैयार किए। अब चार एकड़ के लिए बीज उपलब्ध हो गए हैं। खाकी कपास के प्रति किसानों को जागरूक करने के लिए ललिता विशेष अभियान भी चलाएंगी ताकि किसान कृषि क्षेत्र में बदलाव कर अपनी फसल को अंतरराष्ट्रीय मार्केट तक पहुंचा सकें।

हरियाणा में पैदा होने वाली खाकी कपास का पौधा। सौ. ललित चौधरी

रंगीन कपास की कम जानकारी

डा. रामफल चहल ने बताया कि खाकी कपास जैविक तरीके से उगाई जाती थी, इसलिए इसकी कम उपज होती थी। उस समय खाद या दवाइयां प्रयोग में कम लाई जाती थीं। भारत व अन्य देशों में टेक्सटाइल संस्थानों में रंगीन कपास (खाकी कपास) के बारे में सिर्फ पढ़ाया जाता है। कम ही लोगों को इसकी जानकारी है। एक प्रतिशत लोग भी रंगीन कपास को देख नहीं पाए हैं। खाकी कपास को कताई व बुनाई के बाद इसको पानी से धोने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि सीधा इससे परिधान तैयार कर सकते हैं।

रेजा फैब्रिक से केरल में दिया रोजगार

ललिता चौधरी रेजा फैब्रिक से ग्रामीण महिलाओं के साथ-साथ जेल में कैदियों को भी हैंडलूम की ट्रेनिंग देकर स्वावलंबी बना चुकी हैं। हरियाणा में महिला स्वयं सहायता समूह को भी हैंडलूम, नेचुरल डाई की ट्रेनिंग देकर उनको स्वरोजगार से जोड़ चुकी हैं। अब महिलाएं रेजा फैब्रिक से ज्वेलरी, हैंडबैग, जूते व अन्य परिधान तैयार कर बाजार में बेच रही हैं। इतना ही नहीं केरल सरकार के साथ मिलकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति की 400 महिलाओं को रेजा बनाने और नेचुरल डाई का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। रेजा का उत्पादन 150 वर्ष पहले लगभग बंद हो चुका था। ललिता ने इसे फिर से फैशन में शामिल किया है। पहले रेजा से दरी व खेस तैयार होते थे, लेकिन उन्होंने आधुनिक रूप देकर इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने का काम किया। एसिड अटैक पीडि़ताओं को भी रेजा के परिधान तैयार कर चुकी है ताकि उनको किसी प्रकार की एलर्जी न हो।

पीएम मोदी की भी पसंद है रेजा फैब्रिक

ललिता चौधरी द्वारा रेजा से तैयार किए गए परिधान न्यूयार्क फैशन वीक में भी अपना जलवा बिखेर चुके हैैं। दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, नेपाल, दुबई, अबु धाबी में भी रेजा फैब्रिक की खासी मांग रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी रेजा स्टोल (गमछा) का इस्तेमाल कर चुके हैैं। जापान के प्रधानमंत्री जब भारत दौरे पर आए थे तो मोदी ने भारत के रेजा फैब्रिक से तैयार स्टोल धारण किया था।

Edited By: Manoj Kumar