जागरण संवाददाता, हिसार।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अपने ही रिसर्च स्कॉलर्स के बीच भेदभाव कर रहा है। मामला जेआरएफ इन इंजीनियरिग एंड टेक्नॉलोजी के उम्मीदवारों का है। इन उम्मीदवारों को विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर के चयन के दौरान शॉर्टलिस्टिग क्राइटेरिया में यूजीसी द्वारा ही निर्धारित सात अंक नहीं दे रहे। इससे संबंधित उम्मीदवार चयन में पिछड़ जाते हैं और उनका चयन नहीं हो पाता। यूजीसी के इस फैसले का असर छात्रों के जीवन पर पड़ रहा है। उन्होंने इस बाबत यूजीसी के उच्चाधिकारियों को पत्र व ईमेल के जरिए अपनी समस्या बताई है। हालांकि इस मामले पर यूजीसी की तरफ से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है। हरियाणभर में सभी विश्वविद्यालयों में 200 से अधिक इस प्रकार के उम्मीदवार हैं। इस फैसले का प्रभाव उन पर पड़ेगा। गौरतलब है कि वर्ष 2019 में यूजीसी ने यह नियम लागू किया था। इसके बाद कोविड आ गया तो भर्तियां बंद रहीं ऐसे में यह नियम लागू नहीं हो पाया। फिर वर्ष 2020 में भर्तियां शुरू होनी थी तो कोविड की दूसरी लहर आ गई। ऐसे में अब इसको संशोधित करने की मांग तेज हो गई है। इस मामले को लेकर के जल्द ही शोधार्थियों का एक शिष्टमंडल केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक व यूजीसी चेयरमैन से मिलेगा तथा अपनी मांगों के लिए ज्ञापन पत्र सौपेंगा।

-------------------------- हिसार में उम्मीदवारों ने बैठक कर बनाई रणनीति

इस समस्या को लेकर विभिन्न विश्वविद्यालयों के रिसर्च स्कॉलर्स व शिक्षाविदें की बैठक मधुबन पार्क में हुई। बैठक की अध्यक्षता करते हुए सोशल रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑग्रेनाइजेशन (एसआरडीओ) के प्रदेशाध्यक्ष डा. राजकुमार माहला ने कहा कि विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर के चयन के दौरान शॉर्ट लिस्टिग क्राइटेरिया में नेट विद जेआरएफ के सात नंबर दर्शाए हुए हैं, लेकिन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जेआरएफ इन इंजीनियरिग एंड टेक्नोलॉजी, जोकि एमटेक, एमई व एमफार्मेसी कोर्सेज के छात्रों को रिसर्च में आगे बढ़ाने के लिए अवार्ड की जाती थी, लेकिन यूजीसी ने जेआरएफ इन इंजीनियरिग के शॉर्टलिस्टिग क्राइटेरिया में एमटेक, व एमफार्मा के लिए कोई भी मा‌र्क्स नहीं दर्शाए हैं, जबकि नेट विद जेआरएफ और जेआरएफ इन इंजीनियर टेक्नॉलोजी दोनों ही यूजीसी द्वारा ही प्रदान की जाती हैं।

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इस प्रकार से होता है इंजीनियरिग जेआरएफ में चयन

डा. माहला ने कहा कि नेट की परीक्षा होती है, जबकि जेआरएफ इन इंजीनियरिग टेक्नॉलोजी का चयन विषय विशेषज्ञ पैनल द्वारा साक्षात्कार के माध्यम से किया जाता है। दोनों अवार्डी समान रूप से किसी भी विश्वविद्यालय में सुपरवाइजर की अनुमति से बिना कोई परीक्षा दिए पीएचडी में ज्वाइन कर सकता है और दोनों का ही कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। ऐसे में जब दोनों ही अवार्ड यूजीसी द्वारा दिए जा रहे हैं तो चयन प्रक्रिया में उनके बीच भेदभाव क्यों किया जा रहा है। यह संवैधानिक रूप से पूरी तरह से गलत है।

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शिक्षाविदों ने दी चेतावनी

शिक्षाविदों ने चेतावनी दी कि अगर यूजीसी ने शॉर्ट लिस्टिग क्राइटेरिया में जेआरएफ इन इंजीनियरिग उम्मीदवारों को सात नंबर प्रदान नहीं किए तो एक देशव्यापी आंदोलन चलाया जाएगा और जरूरत पड़ी तो मामले को माननीय न्यायालय में भी चुनौती दी जाएगी। इस मौके पर संत कबीर बिग्रेड के प्रदेश अध्यक्ष चौधरी सुल्तान खटक, दलित महापंचायत के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप भुक्कल, इंजीनियर अश्वनी कुंडली, डा. सुमित धारीवाल सहित इंडियन रिसर्च स्कॉलर एसोसिएशन के पदाधिकारी गण उपस्थित रहे।

Edited By: Jagran