बेटी को घोड़ी पर बैठाकर तोड़ी परंपरा, हरियाणा के गांवों में बदल रही शादी की रीत
एक साल पहले हांसी के चोरटापुर बाड़ा गांव में रितु यादव की शादी से पहले घोड़ी पर बनवारा निकाला गया ...और पढ़ें
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हरियाणा में बेटी को घोड़ी पर बैठाकर तोड़ी परंपराएं।
HighLights
रितु यादव की शादी से पहले घोड़ी पर निकली घुड़चढ़ी
परिवार ने बेटियों के लिए भी समान परंपराओं का संदेश दिया
शिक्षा और रोजगार में भी रितु को मिला बराबरी का अवसर
जागरण संवाददाता, हांसी। तारीख थी एक दिसंबर 2025। गांव चोरटापुर बाड़ा की गलियों में घोड़ी पर कोई दूल्हा नहीं, बल्कि दुल्हन बनने जा रही रितु यादव सवार थी। साथ में परिवार और ग्रामीण थे। शादी से पहले निकलने वाली घुड़चढ़ी की वर्षों पुरानी परंपरा उस दिन नए अंदाज में दिखाई दी।
आमतौर पर बेटों के विवाह में निभाई जाने वाली बनवारे की रस्म परिवार ने बेटी के लिए निभाकर संदेश दिया कि खुशियों और परंपराओं पर बेटियों का भी उतना ही अधिकार है। उस दिन की घुड़चढ़ी भले ही अब पुरानी बात हो चुकी है, लेकिन परिवार की पहल आज भी लड़का-लड़की एक समान का संदेश दे रही है।
रितु की कहानी की खासियत केवल घोड़ी पर बैठकर बनवारा निकलवाना नहीं, बल्कि उसके पीछे परिवार की वह सोच है, जिसमें बेटी को पढ़ाई से लेकर रोजगार और पारिवारिक परंपराओं तक बराबर अवसर दिया गया।
रितु के पिता नरेन्द्र यादव सीआरपीएफ में जवान हैं। उसके ताऊ बलवंत प्रधान बताते हैं कि उनके दो बेटे हैं, जबकि छोटे भाई नरेन्द्र के एक बेटा और एक बेटी है। अपनी बेटी नहीं होने के कारण उन्होंने भतीजी रितु को हमेशा बेटी की तरह माना। परिवार ने पहले ही तय कर लिया था कि जब रितु की शादी होगी तो बेटे की शादी की तरह ही सभी खुशियां मनाई जाएंगी।
पढ़ाई के लिए दिल्ली भेजा, बैंक में बनी डिप्टी मैनेजर
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बराबरी की यह सोच केवल विवाह की रस्मों में दिखाई नहीं दी। परिवार ने रितु की शिक्षा में भी कोई कमी नहीं छोड़ी। उसे पढ़ाई के लिए दिल्ली भेजा गया, जहां उसने स्नातक और एमए की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद बैंकिंग क्षेत्र में नौकरी हासिल की और आगे बढ़ते हुए डिप्टी मैनेजर के पद तक पहुंची।
चार दिसंबर को थी शादी, तीन दिन पहले निकली थी घुड़चढ़ी

रितु की शादी चार दिसंबर 2025 को गुरुग्राम के एक व्यवसायी के साथ तय थी। इससे तीन दिन पहले एक दिसंबर को परिवार ने उसकी घुड़चढ़ी निकालकर अपने अरमान पूरे किए। परिवार का कहना था कि जब बेटी पढ़ाई और नौकरी में बेटों से पीछे नहीं है तो शादी की खुशियों में फर्क क्यों किया जाए।
वक्त बीता, लेकिन पहल का संदेश आज भी कायम
उस घुड़चढ़ी को समय बीत चुका है, लेकिन इसके पीछे दिया गया सामाजिक संदेश आज भी प्रासंगिक है। परिवार की पहल बताती है कि बेटी को बराबरी देने की शुरुआत घर की सोच और व्यवहार से होती है। चोरटापुर बाड़ा में एक दिसंबर 2025 को निकली रितु की घुड़चढ़ी इसी बदलती सोच की एक मिसाल बन गई।
