हिसार, [पवन सिरोवा]। सामाजिक सरोकार की शानदार नजीर और महिला सशक्तिकरण के साथ पर्यावरण संरक्षण की पहल। यह हो रहा है गांव मय्यड़ के सिद्ध महामृत्युंजय संस्थान में। संस्थान से जुड़कर 1200 से अधिक महिलाएं कपड़े के थैले बनाकर आजीविका कमा रही हैं और साथ ही पॉलिथिन मुक्त राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका अदा कर पर्यावरण बचाव में मिसाल भी कायम कर रही हैं। इन महिलाओं का कहना है कि वे कपड़े का थैला लेकर चलने को फैशन बनाना चाहती हैं। यदि फटी जींस पहनना फैशन हो सकता है तो थैला क्यों नहीं।

स्वावलंबन की डोर के साथ पर्यावरण बचाने की मुहिम

संस्थान पिछले करीब 20 साल में इस कार्य में जुटा है और इसने पिछले दो वर्षों में इस कार्य को मिशन का रूप दिया है। योगी सहजानंद ने महिलाओं के साथ मिलकर दो साल में 1.20 लाख मीटर कपड़े के चार लाख थैले बनवाकर पूरे देश में निश्शुल्क वितरित किए हैं, ताकि देश में पॉलिथिन के कैरी बैग का प्रचलन खत्म हो और कपड़े का थैला हमारी शान बन सके।

दो साल में 1.20 लाख मीटर कपड़े से चार लाख थैले बनवाकर निश्शुल्क वितरित किए

घर की दहलीज में अपनी आर्थिक स्थिति को कोसने वाली महिलाओं को सिद्ध महामृत्युंजय अंतरराष्ट्रीय योग एवं ज्योतिष अनुसंधान केंद्र ने स्‍वावलंबन का मंच प्रदान किया। शुरूआत में संस्थान के आसपास रहनेवाली महिलाओं को इससे जोड़ा गया और उन्हें थैले की सिलाई सिखाई। इसके बाद संस्थान ने उन्हें थैले सीलने का कार्य सौंपा। एक महिला एक दिन में 30 से 40 थैले सीलने लगी, जिससे उन्हें आर्थिक लाभ होने लगा। संस्थान ने गरीब, दिव्यांग और विधवा महिलाओं को जोड़ा और उन्हें रोजगार देकर स्वावलंबी बनाया, जिससे इन्हें अपने आप पर  गर्व होने लगा।

संस्‍थान से जुड़ीं रीना, सरोज, ऊषा, संतोष, राजरानी, तनीषा, गीता, कविता, सुमन और प्रीति सूरी ने कहा कि फटी जींस पहनना फैशन बन सकता है तो हमारे प्रयास हैं कि हमारा थैला फैशन बने। इसके लिए संस्थान के माध्यम से हम सब प्रयासरत हैं। स्वामी सहजानंद ने कहा, मेरा सपना देश को संस्थान के माध्यम से पॉलिथिन मुक्त राष्ट्र के निर्माण में याेगदान देना है। यहां बना थैला देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री, नेता और गवर्नर को भेंट कर चुके हैं।

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भीलवाड़ा की 375 फैक्टरियों के बचे कपड़े से बना रहे हैं थैला

भीलवाड़ा की 375 फैक्टरियों का कपड़ा, जिससे इंटरनेशनल ब्रांड के कोट-पेंट तैयार होते हैं, जिसे पहनकर देश-विदेश के लोग गर्व महसूस करते है। इन फैक्टरियों से बचे हुए कपड़े को कम दाम में खरीदा जाता है। उसी कपड़े से जरूरतमंद महिलाएं थैले तैयार करती हैं, जो निशुल्क वितरित होते हैं।

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निश्शुल्क वितरण के लिए ऐसे जुटाते हैं राशि

आप सोच रहे होंगे कि निशुल्क थैले कैसे वितरित कर रहे हैं। इसमें जो कंपनी या पार्टी अपना विज्ञापन करवाना चाहती है, उसका नाम उसपर छाप दिया जाता है और उन्हीं से थैले की राशि लेकर बाजार में निश्शुल्क थैले वितरित किए जाते हैं। प्रिंटिंग खर्च बचे इसके लिए ग्रामीणों को ही प्रिंटिंग सिखाई गई।

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अभियान की ऐसे हुई शुरुआत

हिसार बस स्टैंड से करीब 15 किलोमीटर दूर गांव मय्यड़ में योगी सहजानंद नाथ ने साल 2000 में सिद्ध महामृत्युंजय अंतरराष्ट्रीय योग एवं ज्योतिष अनुसंधान केंद्र बनाया। उन्होंने डब्ल्यूएचओ की एक पॉलिथिन के दुष्प्रभाव व बढ़ते कैंसर पर रिपोर्ट पढ़कर जीवन में पर्यावरण बचाव के लिए कदम उठाया। इसके तहत उन्होंने दो साल पहले इसी केंद्र से पर्यावरण बचाव में मिशन ग्रीन प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जिसके तहत उन्होंने देश का बड़ा चिकित्सा संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) से लेकर आरएसएस सहित कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर अभियान को आगे बढ़ाया।

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Posted By: Sunil Kumar Jha

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