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पराली प्रबंधन से चमकेगी किसानों की किस्मत, मिट्टी की उर्वरता के साथ जेब भी भरेगी; जानिए HAU के प्रोफेसर का फॉर्मूला

Published: Tue, 13 Oct 2026 05:05 AM (IST)

कृषि विशेषज्ञ डॉ. मुकेश जैन के अनुसार, पराली प्रबंधन के लिए मशीनें किसानों के लिए आय का स्रोत बन सकती हैं और मिट्टी की उर्वरता बचा सकती हैं।

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HighLights

  1. पराली खेत में मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी।

  2. सुपर सीडर, बेलर मशीनें पराली प्रबंधन में सहायक।

  3. पराली से आय और प्रदूषण नियंत्रण संभव।

जागरण संवाददाता, हिसार। धान की पराली का प्रबंधन किसानों के लिए केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि अगली फसल की समय पर बिजाई और खेती की लागत से भी जुड़ा है। धान की रोपाई का समय आगे बढ़ने से कटाई देर से होने लगी है, जिससे खेत खाली करने और अगली फसल बोने के लिए किसानों के पास कम समय बचता है। ऐसे में पराली जलाने से बचने के लिए कृषि मशीनों का प्रभावी उपयोग और फसल अवशेषों से कमाई के विकल्प अहम हैं।

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के फार्म मशीन एवं पावर इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डा. मुकेश जैन ने जागरण विमर्श में कहा कि पराली को खेत में मिलाना सबसे उपयुक्त विकल्प है। जहां यह संभव न हो, वहां पराली को खेत से बाहर निकालकर उद्योगों में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने मशीनों की उपलब्धता, पराली से होने वाली कमाई और किसानों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि की प्रक्रिया पर भी चर्चा की।

रोपाई में देरी से बढ़ी है चुनौती

डा. जैन ने बताया कि भूजल बचाने के लिए धान की रोपाई का समय आगे किया गया। इससे कटाई भी देर से होने लगी और किसानों के सामने अगली फसल की बिजाई के लिए समय की कमी बढ़ी। पराली जलाने से वायु प्रदूषण के साथ मिट्टी के पोषक तत्व और मित्र कीट भी नष्ट होते हैं। उनके अनुसार, पराली मिट्टी में मिलाने से अगली फसल में खाद की जरूरत घटाने में मदद मिल सकती है।

सुपर सीडर और बेलर से प्रबंधन बढ़ाना होगा उन्होंने बताया कि सुपर सीडर पराली को काटकर मिट्टी में मिलाने वाली उपयोगी मशीन है। इस सीजन में इसके लिए करीब 17 से 18 हजार किसानों ने आवेदन किया है। हालांकि, इसके संचालन में अधिक ईंधन और शक्तिशाली ट्रैक्टर की जरूरत पड़ती है। दूसरे विकल्प में बेलर मशीन से पराली की गांठें बनाकर उसे खेत से बाहर निकाला जाता है।

इससे पैलेट और ब्रिकेट बनाने, बिजली उत्पादन तथा पैकेजिंग उद्योग में इस्तेमाल की संभावनाएं बनती हैं। डा. जैन के अनुसार, इस सीजन में पराली आठ से दस रुपये प्रति किलो तक बिकने की बात सामने आई है।

मशीनें उपलब्ध, प्रक्रिया सरल बनाने की जरूरत

डा. जैन ने दावा किया कि हरियाणा में करीब 30 हजार कस्टम हायरिंग सेंटर और किसानों को दी गई डेढ़ लाख कृषि मशीनों के कारण मशीनों की उपलब्धता में बड़ी कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि किसानों को पराली प्रबंधन के लिए खेत की स्थिति और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार मशीन चुननी चाहिए।

जहां अधिक मात्रा में पराली हो, वहां कुछ हिस्सा बाहर निकालकर शेष को मिट्टी में मिलाया जा सकता है। विमर्श के दौरान किसानों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि का विषय भी उठा। उन्होंने माना कि राशि जारी करने की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए, हालांकि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि पराली नहीं जलाई गई और मशीनों का उपयोग हुआ है।

प्रदूषण में योगदान पर रखी बात

विमर्श में उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि वायु प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान पांच से सात प्रतिशत आंका गया है। उन्होंने कहा कि किसानों को दोषी ठहराने के बजाय उन्हें व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है।

उनका मानना है कि जागरूकता, मशीनों के उपयोग और पराली के व्यावसायिक इस्तेमाल से इसे जलाने की घटनाओं में और कमी लाई जा सकती है। हरियाणा को शून्य पराली दहन के लक्ष्य की ओर बढ़ाने के लिए किसानों की भागीदारी अहम रहेगी।