झज्जर, प्रवेश चौहान। झज्जर में इन दिनों कुत्तों द्वारा काटे जाने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जिस वजह से प्राय: हर किसी के मन में विशेष तौर पर आवारा कुत्तों को लेकर अलग सा डर बनता नजर आ रहा है। अभी हाल ही में पानीपत के निजी अस्पताल में एक कुत्ते द्वारा 6 गेट पार करते हुए 2 दिन के नवजात को उठा ले जाकर, नोच कर मार डालने का मामला सामने आया है।

कुरुक्षेत्र में भी खेत में कुत्तों ने 10 साल के बच्चों को नोच कर मार डाला है। वहीं, झज्जर जिले की बात करें तो यहां भी रोजाना आवारा कुत्तों के काटने के मामले सामने आ रहे हैं। सिविल अस्पताल की एमएस डाक्टर कनिका के मुताबिक अस्पताल में रोजाना 8 से 10 मामले कुत्तों के काटने के सामने आ रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि दो से तीन मामले इनमें ऐसे भी हैं जहां पालतू कुत्तों द्वारा काटा गया है और बाकी मामले आवारा कुत्तों के काटने द्वारा हैं।

एंटी रेबीज इंजेक्शन की नहीं कोई दिक्कत

डाक्टर कनिका ने बताया कि अस्पताल में एंटी रेबीज इंजेक्शन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। स्टाक की किसी भी तरह की दिक्कत नहीं है। प्राय: शेड्यूल के हिसाब से पहुंच रहे लोगों को इंजेक्शन दिए जा रहे हैं।

बढ़ती गर्मी से कुत्तों के स्वभाव पर पड़ रहा प्रतिकूल असर

विशेषज्ञ चिकित्सक के मुताबकि पालतू कुत्तों के काटने का मुख्य कारण गर्मी की वजह से बढ़ता चिड़िचिड़ापन है, जिस वजह से कुत्तों में आक्रमकता बढ़ती जा रही है। छुट्टियां होने की वजह से बच्चे अधिकतर समय कुत्तों के साथ खेलते रहते हैं। चिड़चिड़ेपन की वजह से पालतू कुत्ते भी उन पर हमला कर देते हैं। वहीं, आवारा कुत्तों के काटने का भी मुख्य कारण लगातार बढ़ता तापमान के रुप में सामने आ रहा है। गर्मी अधिक पड़ने की वजह से आवारा कुत्तों को एक जगह चैन नहीं मिल पाता। एक तो उनके पास वैसे ही रहने के लिए कोई स्थान नहीं होता और रास्ते में इधर-उधर घूमते रहते हैं। इस दौरान आवारा कुत्ते रास्ते में चलते हुए लोगों को अपना शिकार बना लेते हैं।

नगर निगम की तैयारी कैसी है ?

दरअसल, बढ़ते मामलों को लेकर झज्जर प्रशासन कितना सतर्क है, ऐसे यहां पर हालात नहीं दिख रहें। क्योंकि, आवारा कुत्तों के काटने के मामलों को लेकर फिलहाल नगर निगम के पास कोई योजना नहीं है। निगम की ऐसी कोई भी तैयारी नहीं है, जिससे बढ़ते आवारा कुत्तों के काटने के मामलों पर लगाम लगाया जा सके।

कुत्तों में पाया जाता है कैनाइन डिस्टेंपर वायरस

कैनाइन डिस्टेंपर किसी भी उम्र के कुत्तों को गंभीर रूप से बीमार बना सकता है। मगर बड़ी उम्र के कुत्तों में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस इनफेक्शन के मामले अभी तक दुर्लभ है। यह पैरामाइक्सोवायरस के कारण होता है, जिसे सीडीवी (कैनाइन डिस्टेंपर वायरस) भी कहा जाता है। यह अत्यधिक जानलेवा संक्रमण है। इसके लक्षणों में छींकना, खासी, आंखों से कोई पदार्थ निकलना, बुखार, उल्टी, दस्त और भूख न लगना शामिल हो सकते हैं। कुत्तों के काटने का मुख्य कारण यह बीमारी भी है।

जिन कुत्तों को पहले कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण हुआ है। उन्हें बाद में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं। कैनाइन डिस्टेंपर के लिए एक टीका मौजूद है, सबसे अहम बात है कि कोई दवा उपलब्ध नहीं है। इसलिए, यह सुनिश्चित करें कि पशु चिकित्सक द्वारा छह से आठ सप्ताह की उम्र में कुत्ते को टीका जरूर लगवाएं। यदि किसी कुत्तों को जन्म से या उसके बचपन से नहीं पाला गया है, और यदि एक बड़े कुत्ते को पालते हैं तो उस समय हम नहीं जानते कि उसे टीका लगाया गया है या नहीं। इस मामले में अपने पशु चिकित्सक को सूचित करें ताकि वे आपके पालतू जानवरों के लिए एक उपयुक्त टीकाकरण योजना तैयार कर सकें।

अकेले झज्जर के नागरिक अस्पताल में रोजाना 8 से 10 मामले कुत्तों द्वारा काटे जाने के आ रहे हैं।जबकि, बहादुरगढ़ स्थित नागरिक अस्पताल के अलावा उप-मंडल स्तर पर निजी अस्पतालों में भी उपचार के लिए पीड़ित जरूर पहुंच रहे होंगे। जिससे साफ पता चलता है कि हालात किस हद तक गंभीर है। फिलहाल, अभी तक आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए किसी भी तरह के कोई निर्देश नहीं मिले हैं। जब कोई निर्देश मिलेंगे तभी नियमानुसार कार्यवाही की जाएगी।

----अरुण नांदल, नगर निगम, ईओ।

Edited By: Naveen Dalal